आदिम लय की सामूहिकता का प्रतीक है आदिवासी नृत्य महोत्सव



सुभाष की बात- छत्तीसगढ़ की राजधानी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में हिस्सा लेने दुनिया के कई देशों के ट्राइबल कलाकार आए हुए हैं. इस बहाने कई राज्य़ों और देशों के आदिवासी समाज को करीब से देखने का मौका मिला. भले ही रंग रूप बोली भाषा जुदा हो लेकिन इस समाज की एक खासियत समान रूप से दिखी वो है इनकी सहजता. आदिवासी बस्तर का हो या फिर उत्तर पूर्व का या फिर अफ्रीका का या फिर आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश का वो बेहद सरल है. वो इस तेज रफ्तार जीवन शैली के बीच भी अपनी परंपराओं से बंधा हुआ है. वो प्रकृति की गोद में बेहद सीमित संसाधन पाकर भी खुश है. दुनिया भर के आदिवासी कलाकारों को इस तरह जोड़ने की पहलकीसराहना हम पहले भी कर चुके हैं।

जूरी सदस्य के रूप में मैंने जो कुछ महसूस किया, सोचा उसे दोस्तों से साझा करूँ 

छत्तीसगढ़ के 22 लें राज्योत्सव के अवसर पर तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव के मंच से प्रस्तुत नृत्य , गीत , संगीत मनुष्य की आदिम लय और सामूहिकता का प्रतीक बनकर प्रकृति और परंपरा के साथ जुड़ाव की अभिव्यक्ति बनकर जनमानस के दिलोदिमाग़ पर छाये रहे । अधिकांश नृत्य एक गोल घेरे में अपनी प्रस्तुति देते दिखे जो यह बताते हैं की आदिवासी समुदाय को नृत्य करने के लिए किसी सुव्यवस्थित मंच की ज़रूरत नहीं है ।

सांस्कृतिक केन्द्रों या अलग इंवेट कंपनियों के माध्यम से ही सही बुलाये गये अधिकांश डांस ग्रूप अपनी परंपरागत नृत्य शैली , वेशभूषा और वाधयंत्र और गीत संगीत के प्रस्तुति करते दिखे । कुछ ने कोरियोग्राफ़र की मदद से निर्णायकों और लोगों को प्रभावित करने के लिए भी थोड़ी बहुत उछलकूद की ,कैमरे के लिये दृश्य बनाये।

छत्तीसगढ़ एक आदिवासी आबादी बाहुल्य राज्य हैं जिनका बड़ा हिस्सा वनों से आच्छादित है । यहाँ के आदिवासी वैसे ही प्रकृति के क़रीब हैं जैसे की दुनिया के बाक़ी हिस्सों के । छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का तीसरी बार हुए इस आयोजन में भी पिछले दो आयोजनों की तरह ही आदिम संस्कृति की झलक देखने मिली । छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नगाड़ा बजाकर इस समारोह की शुरुआत की । छत्तीसगढ़ के दो अलग -अलग ध्रुव बस्तर और सरगुजा के जशपुर में बसे आदिवासियों को छत्तीसगढ़ के केन्द्र में नृत्य महोत्सव के बहाने स्थापित करने की पहल सार्थक रही।

आदिवासी डांस फ़ेस्टिवल समापन समारोह के मुख्य अतिथि झारखण्ड के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन को मंच से कहना पड़ा कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल राज्य में ऐसे वर्ग को आगे बढ़ा रहे हैं जिनका सदियों से शोषण हुआ है। उनकी सरकार आदिवासी, दलित और पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने के साथ ही सबके विकास के लिए कार्य कर रही है। मुझे इस मंच में आकर गौरव महसूस हो रहा है ।झारखंड और छत्तीसगढ़ में इतनी समानता है कि दोनों राज्यों के कई ऐसे क्षेत्र है। जहां पता लगाना मुश्किल है कि यह क्षेत्र दोनों राज्यों में से किस राज्य का है। वास्तव में झारखंड और छत्तीसगढ़ दोनों भाई है। दोनों राज्य के लोगों के राज्यों के लोगों का एक-दूसरे के राज्य में आना-जाना लगा रहता है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री बघेल राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव के माध्यम से पूरे देश और दुनिया में आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, जो सदियों से संघर्ष कर रहा है।

भूपेश बघेल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि आदिम संस्कृति सभी को जोड़ने का कार्य करती है। इसे सहेज कर और इसकी खूबसूरती को बड़े फलक पर दिखाने के उद्देश्य से हमने राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन किया है।
राष्ट्रीय आदिवासी डांस फ़ेस्टिवल में फसल कटाई की श्रेणी में प्रथम स्थान पर छत्तीसगढ़ के करमा नृत्य को, दूसरे स्थान पर ओडिशा के ढेंगसा नृत्य को और तीसरे स्थान पर हिमाचल प्रदेश के गद्दी नृत्य को पुरस्कृत किया गया। इस श्रेणी में सांत्वना पुरस्कार असम को दिया गया।
विवाह संस्कार में पहला स्थान सिक्किम को-* विवाह संस्कार एवं अन्य श्रेणी में पहला स्थान सिक्किम के तमांग सेलो नृत्य को, दूसरा स्थान ओडिशा के घुड़सा नृत्य को और तीसरा स्थान झारखंड के डमकच नृत्य को मिला। विशेष ज्यूरी सांत्वना सम्मान असम को और गुजरात को मिला। इस श्रेणी में सांत्वना पुरस्कार गुजरात के सिद्धी धमाल नृत्य को दिया गया।

जूरी के निर्णायक आयोजकों के व्यवहार से निराश हुए

तीन दिन तक चले आदिवासी नृत्य महोत्सव और प्रदर्शनी की जूरी सदस्यों को तब बहुत निराश होना पड़ा जब उन्हें समापन समारोह के मंच से तयशुदा कार्यक्रम और आमंत्रण के बावजूद सम्मान के लिए मंच पर नहीं बुलाया गया । अलग-अलग राज्यों से आये कलावि़ेशेषज्ञ , पद्मश्री तथा समाचार पत्रों , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों , साहित्यकारों ने जूरी के सदस्य के रूप में अपना बहुमूल्य समय दिया किन्तु मुख्यमंत्री की व्यस्तता और चंडीगढ़ प्रवास की आड़ में आयोजकों ने जूरी सदस्यों को बुलाकर भी मंच से सम्मानित नही किया । कुछ सदस्यों ने मौक़े पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। दो अलग अलग श्रेणियों में हुई इस नृत्य प्रतिस्पर्धा में प्रकृति के साथ,पर्यावरण और दुनियाभर की आदिम संस्कृति में एकरूपता दिखाई दी।

वर्ष 2019 से प्रारंभ यह डांस फ़ेस्टिवल वर्ष 2020 में कोरोना की वजह से नहीं हो पाया । 2021 में दूसरा राष्ट्रीय डांस फ़ेस्टिवल हुआ । पहले समारोह में जहां 1262 आदिवासी कलाकारों ने हिस्सा लिया वहीं 6 देश लंका , यूगांडा , मालदीव , थाईलैण्ड , बांग्लादेश और बेलारूस के 59 ऐथेनिक आर्टिस्टों ने हिस्सा लिया । दूसरे साल 2021 में कोरोना की भीषण त्रासदी से थोड़ी सी निजात पाकर सात देशों के कलाकारों के साथ 1149 कलाकारों ने हिस्सा लिया । इस बार स्विट्ज़रलैंड, माली ,निगारिया,श्रीलंका,फ़िलिस्तीन,यूगांडा और उज़बेकिस्तान के 60 कलाकार हिस्सा लेने आये । धीरे-धीरे ये कारवाँ बढ़ता गया । तीसरे डांस फ़ेस्टिवल में इस बार दस से अधिक देश के डांस ग्रूप ने हिस्सा लिया ।
खेती ,पर्व, अनुष्ठान एवं विवाह पर आधारित नृत्यों पर आधारित इस राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में भारत के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों समेत दस देशों मोजांबिक, मंगोलिया, टोंगो, रशिया, इंडोनेशिया, मालदीव, सर्बिया, न्यूजीलैंड, इजिप्ट और रवांडा के 1500 जनजातीय कलाकारों ने हिस्सा लिया।

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