*जशपुर की दिवाली पूरे देश में निराली, गौरवशाली जनजातीय परंपरा का अनूठा संगम, परंपरा यह कि यहां सामाज के लोग आज भी करते है, पूर्वजों का अनुशरण, दीपावली के दिन दुश्मन भी बन जाते है.., दोस्त.., पैर छूकर मांगते हैं.. माफी, जनजातीय आदिवासी बाहुल्य जशपुर के अनोखी दीपावली की एक्सकुलुसिव खबर..,पढ़िये ग्राउंडजीरो ई न्यूज की रिपोर्ट पर….सजन बंजारा, सोनू जायसवाल व ग्राउंड जीरो टीम की खास रिपोर्ट…..*



 

जशपुर-कोतबा। जनजातीय बहुल जशपुर जिले में हर त्योहारों की तरह दीप पर्व भी अनेक विशेषताएं लिए हुए आज भी जशपुर जिले के की संस्कृति को जीवंत बनाए हुए है। यहां की दिवाली पूरे देश भर में निराली है। एक ओर जहां सामान्य रूप से लक्ष्मी पूजा व घरों में दीप जलाते हुए सजावट की प्रक्रिया के साथ आतिशबाजी हर तरफ देखने को मिलती है वही कई सांस्कृतिक परंपराएं भी यहां आज भी जिले के निवासी उसी आस्था और विश्वास के साथ मनाते हैं।

जनजातीय समुदाय में दिवाली पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन जिले में निवासरत बंजारा समाज के लोग पूजा अर्चना और दीप प्रज्जवलन के बाद घर-घर भ्रमण करते है और वर्ष भर में हुई किसी भी प्रकार की गलती के लिए एक दूसरे से माफी मांगते हैं।
वनों से अच्छादित जशपुर जिले के तीन राज्यों से लगे होने के कारण न सिर्फ यहां भाषाई विविधता देखने को मिलती है, बल्कि अलग-अलग राज्यों का सांस्कृतिक संगम भी देखने को मिलता है। दिवाली पर यहां की परंपरा अनूठी है। बंजारा समाज के लोग इस रात छोटे बड़ों का पैर छूकर आर्शीवाद लेते हैं और दुश्मनों से भी सारे गिले- शिकवे दूर कर लेते हैं। दीपावली पर बंजारा समाज के व्यवहार का अब अन्य समुदायों में भी सम्मान के साथ अनुकरण किया जा रहा है। समाज के लोग अन्य समाज के लोगों से किसी प्रकार की त्रुटियों के लिए क्षमा मांगते हैं।

लक्ष्मी को खुश करने मुर्गे की बलि

जनजातीय समाज लोग इस पर्व पर मुर्गे की बलि देते हैं। यह पूजा गोपनीय होती है और केवल परिवार के सदस्य ही शामिल होते हैं। जनजातीय समाज के द्वारा अपने गोत्र के अनुसार अलग-अलग रंग के मुर्गे की बलि देते हैं। मान्यता के अनुसार दिवाली के दूसरे दिन सुबह यह पूजा की जाती है। इस पूजा को सोहराई कहा जाता है। जनजातीय समाज के बजरंग राम नगेसिया ने बताया कि पूजा के क्रम में सबसे पहले मुर्गे की बलि चढ़ाई जाती है, फिर मवेशियों की पूजा करके महिलाओं के द्वारा उन्हें परीछा जाता है।

मवेशियों के लिए हड़िया शराब

दिवाली के दूसरे दिन जनजातीय समाज के लोग मवेशियों का श्रृंगार कर पूजा करते हैं तो विशेष पकवान के साथ उन्हें हड़िया शराब पिलाते हैं। इस दिन मवेशियों का उपयोग कृषि कार्य में नहीं किया जाता है। मवेशियों को शराब पिलाने से पहले शराब से ही मवेशियों के पैर धोए जाते हैं। मक्का, उड़द सहित अन्य विशेष भोजन दिए जाते हैं। मवेशियों को चढ़ाए गए पकवान से बचे भाग को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस पूजा के कुछ रस्मों में पुरुष वर्ग ही भाग लेते हैं वहीं कई कार्य केवल महिलाओं के द्वारा ही किए जाते हैं।

छत पर अरंडी के पत्ते

दिवाली के एक दिन पूर्व से अरंडी का पत्ता घरों के छप्पर पर लगाया जाता है। मान्यता है कि घरों में इस पत्ते को लगाने पर जहां बुरी आत्माओ का प्रवेश घर पर नहीं होता है। वैज्ञानिक तथ्य है कि इस पत्ते से रोगमुक्ती मिलती हैं।

अन्नपूर्णा देवी की पूजा

नगर के बालाजी मंदिर में दीपावली के दूसरे दिन अन्नकू ट पूजा की जाती है। इस पूजा में अन्नपूर्णा देवी की पूजा कर धर्मावलंबी वर्ष भर घरों में अनाज के कमी नहीं होने की कामना करते हैं। मंदिरों के साथ कई घरों में भी इस पूजा को उत्साह के साथ किया जाता है। पं मनोज रमाकांत मिश्र ने बताया कि इस पूजा में नए अनाज से बने भोजन का भोग लगाया जाता है। इस दिन को अन्नपूर्णा देवी का दिन माना जाता है।

देर रात जलाए जाते हैं 11 दीप

दीपावली की देर रात गुप्त रूप से पूजा के बाद देर रात 11 दीप जलाए जाते हैं। मान्यता है कि इस रात माता लक्ष्मी भ्रमण के लिए निकलती हैं और 11 दीप देखकर प्रसन्न होती हैं। यह अनुष्ठान स्थाई धन प्राप्ति के लिए किया जाता है।

पितरों की पूजा

दिवाली के दूसरे दिन सुबह स्नान करके जलाशयों के पास गोबर की लड्डूनुमा प्रतिमा स्थापित कर उसमें सिक्का, दूब घास रखा जाता है। इसमें पानी तर्पण किया जाता है। यह तर्पण पितरों के नाम किया जाता है। इस दौरान कच्चे कपड़े में पूजा की जाती है और पुरुष वर्ग ही इसमें शामिल होते हैं। तर्पण के दौरान पूर्वजों का नाम लिया जाता है। महिलाएं घर में नए पात्र में मिष्ठान बनाती हैं। मिष्ठान सभी को प्रसाद बांटा जाता है। शाम के समय महिलांए गोर्वधन गीत गाते हुए घर-घर संपर्क कर दीप पर्व की शुभकामनाएं देती हैं। इस पर्व पर बंजारा समाज के के लोगों का बेहद ही उपासक और पूर्वजो के नियमों का पालन किया जाता है.समाज में जिन पितरों के नाम याद हैं, उनके नाम से अलग-अलग दीप जलाने की प्रथा भी है।