भानुप्रतापपुर उपचुनाव बताएगा 2023 का गणित



 

भानुप्रतापपुर ।  कांकेर के अंतिम राजा भानुप्रताप देव की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद, उनकी स्मृति में एक गांव की स्थापना की गई, जिसका नाम भानुप्रतापपुर रखा गया. वर्तमान में यह क्षेत्र भानुप्रतापपुर विधानसभा के नाम से जाना जाता है यहां 1 लाख 90 हजार से ज्यादा मतदाता निवास करते है जिसमें 98669 पुरुष और 97513 महिला मतदाता है. भानुप्रतापपुर विधानसभा प्रदेश की 80 वीं विधानसभा है. छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के समय इस विधानसभा पर कांग्रेस का कब्जा था लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी देवलाल डुग्गा ने कांग्रेस प्रत्याशी मनोज मांडवी को 1,379 वोटों के मामूली अंतर से हराकर इस सीट पर कब्जा किया था. 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना प्रत्याशी बदला और ब्रम्हानंद नेताम को टिकट दिया लेकिन कांग्रेस ने दोबारा मनोज मंडावी पर भरोसा जताया लेकिन वो इस बार भी भरोसे पर खरे नहीं उतरे.

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2008 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को बीजेपी के हाथों 15,479 वोटों से हार का सामना करना पड़ा. 2013 में बीजेपी ने जहां प्रदेश में तीसरी बार विजय का परचम लहराया वहीं भानूप्रतापपुर विधानसभा उसके हाथ से फिसल गई.

2013 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर मनोज मंडावी को चुनावी मैदान में उतारा लेकिन इस बार बीजेपी की नए प्रत्याशी को खड़े करने की चाल काम नहीं आई और बीजेपी प्रत्याशी सतीश लतिया को 14,896 वोट से हार का मुंह देखना पड़ा.

2018 में बीजेपी पर सत्ता का नशा चरम पर था

साल 2018 में बीजेपी पर सत्ता का नशा चरम पर था लेकिन प्रदेश की जनता का बीजेपी सरकार से मोह भंग हो गया था इसी का खामियाजा था की 2018 के विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में बीजेपी केवल 15 सीटों पर सिमट कर रह गई वहीं कांग्रेस ने 67 सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल कर सरकार बनाई.

इस चुनाव में भानुप्रतापपुर में कांग्रेस की जीत का अंतर 2013 के चुनाव से बढ़ गया और एक बार फिर मनोज मंडावी ने 26,693 वोटों से बीजेपी प्रत्याशी देवलाल दुग्गा हराकर दूसरी बार भानुप्रतापपुर में कांग्रेस को जीत दिलाई.

वर्तमान की बात की जाए तो 16 अक्टूबर 2022 को मनोज मंडावी के निधन के बाद से यह सीट खाली पड़ी है. 2023 के चुनाव में अभी लगभग 14 महीने का वक्त है ऐसे में इस सीट पर उप चुनाव की तैयारियां तेज हो गई है.

सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही जोर लगाते दिखेंगे

निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार किसी भी विधायक के निधन या उसके पद छोड़ देने की स्थिति में उस विधानसभा में 6 माह के भीतर उपचुनाव कराना आवश्यक होता है ऐसे में 2023 विधानसभा चुनाव से पहले भानुप्रतापपुर विधानसभा में होने वाले उपचुनाव के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही जोर लगाते दिखेंगे.

इस उपचुनाव से यह भी स्पष्ट हो जाएगा का प्रदेश की जनता का मन वर्तमान सरकार बनाए रखना है या प्रदेश में एक बार फिर बदलाव की बयार लाने का है.

अकूत खनिज संपदा की भरमार

महाराष्ट्र बॉर्डर से लगे भानुप्रतापपुर में अकूत खनिज संपदा की भरमार है यहां आयरन ओर बड़ी मात्रा में पाया जाता है यहां के 2 ब्लॉक भानुप्रतापपुर, दुर्गुकोंदल में कई माइनिंग कंपनी उत्खनन कर आयरन ओर निकालती है जो देश-विदेश में सप्लाई होता है इन माइनिंग कंपनी में हजारों की संख्या में लोग काम करते है.

माइनिंग कंपनी होने के कारण यहां से बड़ी संख्या में लोडिंग वाहन निकलने है जिससे सड़कों पर काफी लोड पड़ता है यही कारण है की यहां की सड़कों की हालत बेहद खराब है.  भानुप्रतापपुर की सरहदी सीमा से मोहला-मानपुर जिला लगा हुआ है साथ ही दिल्ली राजहरा क्षेत्र की सीमा भी इससे लगी हुई है.

भानुप्रतापपुर विकास के मानचित्र पर काफी आगे

रेल सुविधाओं के शुरु होते ही भानुप्रतापपुर विकास के मानचित्र पर काफी आगे निकल गया.  भानुप्रतापपुर विधानसभा की 3 तहसील भानुप्रतापपुर, चरामा और दुर्गुकोंदल के अंतर्गत 350 से ज्यादा गांव आते है जहां के निवासियों का मुख्य पेशा खेती है आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण इस विधानसभा में गोंड जाति के लोग बड़ी संख्या में निवास करते है साथ ही ओबीसी वर्ग का एक बहुत बड़ा समुदाय भी विधानसभा में चुनाव में मुख्य भूमिका निभाता है.

कांग्रेस और बीजेपी के अलावा इस सीट पर आम आदमी पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी अपना प्रत्याशी उतारते है. इस बार के विधानसभा चुनाव में चारों पार्टीयों के बीच एक अच्छा मुकाबला देखा जा सकता है.

मुद्दे

अकूत खनिज संपदा के चलते भानुप्रतापपुर में विकास की संभावनाएं बहुत है लेकिन जर्जर सड़क,पुल और पुलिया यहां की प्रमुख समस्या है जिसे लेकर यहां की जनता लगातार जनप्रतिनिधियों से इसकी मांग करते आये है लेकिन हर चुनाव में इन्ही समस्या पर चुनाव लड़ा जाता है.

दुर्गूकोंदल में कोटरी नदी पर पुल का निर्माण सभी राजनीतिक दलों के लिए हथियार बन गया है और आने वाले चुनाव में इस मुद्दे पर दोनों राजनीतिक दलों का विशेष फोकस रहेगा.

पिछले कुछ दिनों से प्रदेश में आदिवासी आरक्षण का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है आदिवासी सीट होने के कारण इस बार के विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे का लाभ दोनों ही राजनीतिक दल उठाना चाहेंगे.