राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महाेत्सव का तीसरा दिन, मध्यप्रदेश के आदिवासीयाें ने दिखाई अपनी कला



रायपुर। राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महाेत्सव का आज तीसरा दिन है। मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिला ढिधौरी से पहुंचे कलाकार। कृषि कर्म प्रधान नृत्य करमा, फसल कटाई और कृषि पर आधारित है। यह बैगा जनजाति का लोकप्रिय नृत्य है। मांदर की थाप पर, सिर में रंगीन पगड़ी और मोरपंख से सुसज्जित, लाल व काले परिधान में उत्साह के साथ प्रस्तुति दे रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के करमा नृत्य की झलक महिलाएं  नीली साड़ी पहने और सिर में कलगी लगाए आदिवासी परम्परा की पहचान को सरंक्षित रखते हुए। सामूहिक, सामजंस्य और एकता का संदेश देते हुए।

वाद्य यंत्रों में भी छत्तीसगढ़ की झलक। निशान बाजा,मोहरी, मांदर, टिमटिमि बाजा का प्रयोग करते हुए कर्णप्रिय संगीत के साथ सुंदर प्रस्तुति।

सैताम नृत्य की सुंदर प्रस्तुति

पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के आदिवासी समाज द्वारा किए जाने वाले सैताम नृत्य की सुंदर प्रस्तुति। महिलाएं लाल और हरा के सुंदर परिधान पहनकर नृत्य करती हुई। टीम मध्यप्रदेश के सागर से है। धुन और ताल के साथ गजब का जुगलबंदी देखने को मिल रही है। बांसुरी की मधुर धुन, नगाड़ा की थाप पर मंत्रमुग्ध कर देने वाली नृत्य शैली। यह मध्यप्रदेश में फसल कटाई और विभिन्न पर्वों के शुभ अवसर पर किया जाता है।
ढोल, नगाड़ा, बांसुरी का अद्भुत सामन्जस्य से जो संगीत निकल रहा है। उसने दर्शकों को झूमने को मजबूर कर दिया।

लंबाड़ी नृत्य

राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में  तीसरे क्रम में आंध्रप्रदेश की टीम द्वारा लंबाड़ी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति। आंध्र प्रदेश का लंबाड़ी नृत्य आकर्षक चटकदार रंग बिरंगी परिधानों से सुसज्जित होकर यहां की महिलाओं द्वारा किया जाता है। वे एक घुम्मकड़ जनजातिय से सम्बद्ध रखते हैं।

लंबाड़ी नृत्य में वेश भूषा में कांच,दर्पण के टुकड़ों का उपयोग करते हैं। हाथी दांत की चूड़ियाँ ,कलाई की शोभा बढ़ाती हैं।कृषि में जब समृद्धि आती है। तब खुशी से महिलाएँ यह नृत्य करती हैं।

कलाकारों में गजब का उत्साह है। वह दूसरे कलाकारों के प्रदर्शन पर उनका उत्साह भी बढ़ा रहे हैं।

फसल की कटाई का मौका कितना खूबसूरत होता है और कितना उमंग से भरा, राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव में सैलाम नृत्य कर रहे है। लोककलाकारों ने यह सुंदर दृश्य अपने नृत्य से प्रस्तुत कर दिया। ये मध्यप्रदेश के सागर से आए लोककलाकार थे। चटख रंग वाले परिधानों से सजे हरे-लाल वस्त्रों के साथ लोककलाकारों ने जब अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया तो सचमुच फसल कटाई का उत्सव आंखों के सामने साकार हो गया। इसके साथ ही बांसुरी की धुन और नगाड़े की थाप ने अद्भुत संगीत पैदा किया। इस संगीत की लय में थिरकते लोक कलाकारों के पदचाप से समूचा परिदृश्य जादूई हो गया। नृत्य की खूबसूरती में कलाकारों की सजावट ने चार चाँद लगा दिये। कलाकारों ने परंपरागत वस्त्र पहने थे। बेहद खूबसूरत इन वस्त्रों के साथ ही परंपरागत आभूषणों की सुंदरता ने लोगों का मन मोह लिया।

सैताम नृत्य फसल कटाई के सीजन में बहुत लोकप्रिय है और लोक उत्सव को प्रकट करने का अंचल के लोगों का अपना खास तरीका है। पूरे नृत्य में कलाकारों की जो जुगलबंदी दिखी, वो अद्भुत रही। लोगों ने इस नृत्य को बहुत सराहा।

गुजरात का राठवाँ नृत्य

पुरुष और महिला कलाकारों द्वारा पिरामिड बनाकर नृत्य। आदिवासियों की एक जनजाति है। राठवां, जो मूल रूप से गुजरात के उदयपुर जिले में रहते हैं। इस जनजाति का एक खास लोक नृत्य है, जिसे ‘राठवां नृत्य’ के नाम से जाना जाता है। कभी अपने क्षेत्र विशेष में सिमटा इनका यह डांस कुछ वर्षों से समूचे देश में विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए विशेष पहचान बना चुका है। एक बार इस लोकनृत्य को देखने वाला इस कला का मुरीद हो जाता है। यहाँ इनकी आकर्षक प्रस्तुति दी गयी।

कुनबी नृत्य गोवा

कुनबी नृत्य गोवा के बसने वाले कुनबी, मुख्य रूप से यहां के प्रांत में बसे एक आदिवासी समुदाय हैं,जो यहाँ की सबसे प्राचीन लोक परंपरा को सरंक्षित रखता है।

कुनबी महिलाओं के नर्तकों के एक समूह द्वारा किया जाने वाला तेज और सुरुचिपूर्ण नृत्य, पारंपरिक लेकिन साधारण पोशाक पहने हुए यह जातीय कला के रूप में एक सन्देश है। यह महिलाओं द्वारा किये जाने वाले सामुहिक नृत्य है।

असम के नर्तक दल ने दी “ला ली लांग” लोक नृत्य की शानदार प्रस्तुति

राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव के अन्तिम दिन असम के नर्तक दल ने दी ला ली लांग लोक नृत्य की शानदार प्रस्तुति। यह नृत्य असम के टेवा समुदाय के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है। यह त्यौहार फसल कटाई से जुड़ा हुआ है और मछली पकड़ने के उत्सव के दौरान इसे किया जाता है। मुख्य रूप से उपयोग किए जाने वाले संगीत वाद्ययंत्र ढोलक, हैं।

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