हिंदी परिभाषित करती है…संस्कृत की बेटी होने का… पढ़िए हिंदी दिवस पर कवियत्री रेनू मिश्रा की नवीन कविता।


जनसंवाद/साहित्य डेस्क/
मातृभाषा ‌है जन जन की
ये भाल सुशोभित करती है।

याद दिलाती ये हिंदी हमें
हिंदू ,हिंदुस्तान की ।
दु:ख होता है मन में भारी
पढ़ कर हिंदी की कहानी।
मातृभाषा है जन जन की,ये भाल सुशोभित करती है……..

देश की भाषा हिंदी का
क्यों होता अपमान यहां?
अपने ही घर में बेटी को
क्यों न मिला सम्मान यहां।
मातृभाषा है जन जन की,ये भाल सुशोभित करती है……
हिंदी का ये हाल बताती
आने वाली अंग्रेजी पीढ़ी है।
क्या होगा ?कल और आज यहाॅ
अगर न सुधरा मेरा हिन्दुस्तान यहां।
मातृभाषा है जन जन की, ये भाल सुशोभित करती है ….

वो दिन अब दूर नहीं , जब माथे की ये बिंदी
ऑखों से अश्रु बन कर झर झर बरसेगे।
हर दिन हर घर में हिंदी का
नित होता तिरस्कार जहाँ।
अब वो दिन दूर नही वृद्धाश्रम में होगा
जब हिंदी का स्थान यहां।
मातृभाषा है जन जन की,ये भाल सुशोभित करती है……

राह से भटके हिंदुस्तानी
रख हिंदी का सम्मान जरा
ऋषियों की इस धरती पर हो
हिंदी का गुणगान सदा।
भारत ‌की राजदुलारी का हरदम
हो सम्मान यहां।
मातृभाषा है जन जन की ,ये भाल सुशोभित करती है …..

स्वामी दयानंद जी ने हिंदी का अलख जगाया था
देश में ही नहीं हिंदी का ,
विश्व में परचम लहराया था
हिंदुस्तानी हो अगर देश‌ के तुम
हिंदू बनकर हिंदी को अपनाओ।
मातृभाषा है जन जन की, ये भाल सुशोभित करती है……

संस्कृति राह से भटक रही
और हिंदी जुबां से छूट रही,
वसुंधा आज पुकार रही,
देश के सच्चे हिंदुस्तानी बनकर
इस राह पर अडिग डटा रह
माथे पर हिंदी का तिलक कर
,माथे पर हिंदी का तिलक कर।
मातृभाषा है जन जन की,ये भाल सुशोभित करती है……

स्वरचित
रेणु मिश्रा भिलाई छत्तीसगढ ।