ये कर चुके हैं सुसाइड की काेशिश, उसे मानते हैं सबसे बड़ी भूल, अब इतने खुश कि जीना चाहते हैं 100 साल , June 16, 2020 at 05:42AM

  • डिप्रेशन से बाहर निकालने रायपुर पुलिस चुप्पी ताेड़ाे कैंपेन चला रही है। सायकाेलाॅजिस्ट घर जाकर करते हैं काउंसिलिंग।
  • इस कैंपेन के तहत अब तक 1 हजार से ज्यादा लोगों की काउंसिलिंग की जा चुकी है। हर 15 दिन में फॉलोअप भी ले रहे।
  • रविशंकर यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग ने 35 काउंसलर्स का ग्रुप बनाया है। ये लोगों को डिप्रेशन से बाहर निकालने फ्री काउंसिलिंग कर रहे हैं। इस ग्रुप से 9406489932 पर संपर्क कर सकते हैं।ॉ

जिंदगी बचाने के इक्विपमेंट बेचने वाले मुर्तजा ने 3 बार की सुसाइड की कोशिश, मेडिटेशन से मन हुआ शांत
ये कहानी है 50 साल के मुर्तजा नाजीम की। बैरन बाजार में रहने वाले मुर्तजा मेडिकल इक्विपमेंट के हाेल सेलर हैं। वे तीन बार सुसाइड की काेशिश कर चुके हैं। सबसे पहले बूढ़ातालाब में कूद कर सुसाइड करने की काेशिश की। तालाब में छलांग लगाते वक्त कुछ लाेगाें ने देख लिया और जान बचा ली। इसी दिन, रात ढाई बजे नशीली दवाएं खा लीं, फिर भी बच गए। दूसरे दिन नींद खुलते ही घर से निकले और कार के सामने कूद गए। चाेट आई, लेकिन इस बार भी जान बच गई।
हाथ से काम फिसला ताे हाे गए डिप्रेस : मुर्तजा ने बताया, बड़ी कंपनियाें का काम मेरे हाथ से चला गया था, इससे बेहद परेशान था। पैसा पर्याप्त था, पर अजीब लग रहा था। लगने लगा था कि लाइफ में कुछ बचा ही नहीं है। अब अहसास हाेता है कि सुसाइड नहीं करना चाहिए था। वाे सबसे बड़ी भूल थी। अब इतना खुश हूं कि 100 साल जीना चाहता हूं।

ऐसे बाहर निकले डिप्रेशन से
बुरे वक्त में पत्नी बतुल ने न सिर्फ घर और मुझे संभाला, बल्कि बिजनेस भी संभाला। राेज एक घंटे मेडिटेशन और याेग करने लगा। इससे मन शांत हुआ। घरवालाें के साथ राेज बैडमिंटन खेलता था, इससे खुश रहने लगा। धार्मिक किताबें पढ़ता था, इससे जीवन का माेल समझ आया। फिर डिप्रेशन की दवा भी बंद हाे गई। अब जिंदगी से बेहद खुश हूं। अब दूसरों को सुसाइड जैसा बड़ा कदम न उठाने प्रेरित करता हूं।

करियर की चिंता में कूद गए छत से, हड्डियां टूटीं ताे समझ आया कि अनमोल है जिंदगी, अब बचाते हैं दूसरों की जान
ये कहानी है 25 साल के डॉक्टर अतुल कुमार की। मेडिकल के एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी के लिए 2012 में पैरेंट्स ने उनका एडमिशन कोटा के कोचिंग सेंटर में करा दिया। वहां हर कोई ज्यादा नंबर पाने की काेशिश में जुटा था। इस काॅम्पिटीटिव वर्ल्ड में अतुल थाेड़ा परेशान रहने लगे। 2013 में अतुल काे रायपुर केे ही मेडिकल काॅलेज में एमबीबीएस में एडमिशन मिल गया। पढ़ाई के दौरान अक्सर ये साेचने लगे कि एंट्रेंस एग्जाम ताे क्लीयर हाे गया, अब क्या एमबीबीएस अच्छे से हाे जाएगा ? अतुल एमबीबीएस के हर सेमेस्टर क्लीयर कर रहे थे, लेकिन करियर की चिंता उन्हें अब भी सता रही थी। नवंबर 2016 में उन्हाेंने बिल्डिंग से छलांग लगा दी। जान बच गई लेकिन हाथ फ्रैक्चर हो गया। सुसाइड की बात उन्हाेंने सबसे छुपा ली। हड्डियां टूटीं ताे जिंदगी की कीमत पता चली। खुश रहने म्यूजिक सुनने लगे। सक्सेस स्टाेरी पढ़ने लगे। सब भूलकर फिर से पढ़ाई में जुट गए। पीजी करने के दाैरान 2018 में बैक लगा तो फिर डिप्रेशन से घिर गए। तय किया कि अगर 2019 तक करियर नहीं बना तो सुसाइड कर लूंगा। हालांकि,, सब भगवान भराेसे नहीं छाेड़ा। लक्ष्य हासिल करने मेहनत करते रहे। दिसंबर 2019 से वे अंबेडकर अस्पताल में बतौर जूनियर डॉक्टर काम कर रहे हैं।

अब जीना सीख गया हूं...
अतुल कहते हैं, अब जीना सीख गया हूं। बताैर डाॅक्टर दूसराें की जान बचा रहा हूं। इलाज करवाने के बाद जब लाेग घर लाैटते वक्त धन्यवाद कहकर जाते हैं, तब अहसास हाेता है कि जिंदगी कितनी अनमाेल है।
(ये कहानी अंबेडकर हॉस्पिटल के जूनियर डाॅक्टर की है। उनकी रिक्वेस्ट पर नाम बदला गया है।)

ये भी कर रहे निशुल्क काउंसिलिंग
डाॅ. ईला गुप्ता- 9200126862
डाॅ. वर्षा वरवंडकर - 9826132982
(दोनों सीनियर सायकोलॉजिस्ट हैं)



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प्रतीकात्मक फोटो


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