गोलबाजार में रोजाना 20 हजार लोगों का सामना दो-दो फीट की संकरी गलियों से , July 08, 2020 at 06:11AM

ठाकुरराम यादव | नगर निगम और स्मार्ट सिटी पिछले दो साल से राजधानी के बाजारों को स्मार्ट और व्यवस्थित बनाने में जुटे हैं। राजधानी का एक सदी पुराना गोलबाजार इनमें से किसी एजेंसी की सूची में नहीं है। हाल में नगर निगम ऐसे 600 से ज्यादा कारोबारियों को दुकानों का मालिकाना हक देने की तैयारी में है, जो दशकों से काबिज हैं। सरकारी एजेंसियों की सोच है कि इससे कारोबारी उन दुकानों के मालिक बनेंगे, जिनपर उनकी पीढ़ियां किराए से बिजनेस कर रही हैं। निगम को फायदा ये है कि यहां की दुकानों का किराया 150 से 500 रुपए महीना है, जबकि इसी बाजार के आसपास की सौ वर्गफीट दुकान का किराया एक लाख रुपए महीने से कम नहीं हैं। मालिकाना हक देने से रजिस्ट्री और लीज डीड से निगम को 400 करोड़ रुपए की आय की उम्मीद है। लेकिन गोलबाजार में रोजाना आने वाले औसतन 20 हजार लोगों (सर्वे के अनुसार फुटफाॅल) को राहत देने का प्लान एजेंसियों के पास नहीं है। भास्कर ने सर्वे में पाया कि गोलबाजार के भीतरी हिस्से में कई गलियां डेढ़-दो फीट चौड़ी ही बची हैं। जो चार-पांच फीट चौड़ी हैं, वहां दुकानों का सामान इस तरह बाहर है कि एक बार में एक ही व्यक्ति गुजर सकता है। सबसे खराब स्थिति ये है कि इस बाजार में अब तक एक भी टायलेट नहीं बनाया जा सका है।
भास्कर टीम मंगलवार को गोलबाजार की तंग गलियों में पहुंची और लोगों से बातचीत भी की गई। लोगों ने बताया कि हर त्योहार का सामान का सेट यहीं मिलता है, इसलिए सीजन में आने-जाने वाले बढ़ जाते हैं। तब इस बाजार में घुसना मुश्किल है। गोलबाजार शहर का अकेला ऐसा मार्केट है, जहां पार्किंग ही नहीं है। हर व्यक्ति इसके चारों ओर सड़क पर ही वाहन पार्क करता है, जिससे पूरा बाजार जाम हो रहा है। गोलबाजार से लगे बंजारी मार्केट में मनिहारी, खिलौने तथा फैंसी आइट्म्स का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट है। होलसेल खरीदारी करने पहुंचने वाले लोग भी गोलबाजार से ही गुजरते हैं, जहां पहले ही चलने की जगह नहीं है। सबसे बड़ी असुविधा ये है कि इस बाजार में एक भी टायलेट नहीं है।

बिजली नहीं, नल भी नहीं : गोलबाजार में बिजली-पानी की भी सुविधा नहीं है। यानी, यह संभवत: प्रदेश का अकेला बाजार है जो कोरोना काल में भी रात 9 बजे तक खुलता है, लेकिन रोशनी के नाम पर दुकानों की लाइट ही हैं। दुकानें बंद तो गलियों में घना अंधेरा। इस बाजार में पीने के पानी का भी कोई इंतजाम नहीं है। किसी सरकारी एजेंसी ने यहां न तो नल पहुंचाया और न ही बोर किया गया। सफाई का सिस्टम ऐसा है कि गलियां दरअसल दुकानों का हिस्सा हो गई हैं, इसलिए दुकानदार ही साफ करवा लेते हैं। निगम ने यहां कभी सफाई के लिए कोई इंतजाम ही नहीं किए हैं।
खर्च से घबराने लगे व्यापारी : गोलबाजार के कारोबारियों को अभी निगम को महज 100 से 600 रुपए महीने का किराया देना पड़ता है। मालिकाना हक मिलने के दुकानदारों को पहले तो एकमुश्त लाखों रुपए देना पड़ेगा। इसके अलावा उनका मासिक किराया भी काफी बढ़ जाएगा। प्रापर्टी की वैल्यू के अनुपात टैक्स भी काफी बढ़ जाएगा।

जानकारों का कहना है कि मालिकाना हक मिलने से दुकानदारों के स्वामित्व में बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन उनका खर्च और इन्वेस्टमेंट बढ़ जाएगा। इसका असर कारोबार पर भी पड़ने की आशंका है। अभी यह माना जाता है कि गोलबाजार में लोगों को चीजें सही दाम पर मिल जाती हैं।

"गोलबाजार में आम लोगों को बहुत दिक्कतें हैं। इस प्लान में इन दिक्कतों को दूर करने की बातें भी हैं। दरअसल हम गोलबाजार का पूरा कायाकल्प कर देंगे। बिजली और पानी के साथ-साथ बाजार के भीतर सड़क भी मिलेंगी। जवाहर बाजार से पार्किंग की दिक्कत भी दूर होगी।"
-एजाज ढेबर, मेयर रायपुर



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गोलबाजार की गलियां इतनी संकरी हैं कि लोग एक-दूसरे से टकराए बिना गुजर नहीं सकते। कारोबारियों ने बताया कि शुरुआत में बाजार गुंबद के चारों ओर था। गुंबद और दुकानों के बीच इतनी दूरी होती थी कि लोग आराम से खरीदारी कर लेते थे। धीरे-धीरे लोगों ने गुंबद को घेरना शुरू कर दिया। अब गुंबद ही नजर नहीं आता। कोरोना लॉकडाउन के समय सोशल डिस्टेंसिंग की बात हो रही है, लेकिन इस बाजार में डिस्टेंसिंग संभव ही नहीं है।


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