ट्रांसपोर्टर बोले- न लोन की किस्त दे पा रहे, न बीमा की; खरीदार मिले तो बेच देंगे बसें , July 23, 2020 at 05:59AM

कोरोना संक्रमण के पड़ने वाले प्रभाव ने जिले के परिवहन व्यवसाय को लगभग लील ही लिया है। जिले में दोबारा लॉकडाउन होने के बाद एक बार फिर यात्री बसों की रफ्तार पर लगाम लग गई है। बसों पर रोजाना काम करने ड्राइवर, कंडक्टर और अन्य कर्मचारी साढ़े तीन माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बसों के शुरू नहीं होने के चलते आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। इनमें से कोई मकान गिरवी रख रहा है तो कोई गहने, हेल्परों-ड्राइवरों में से कोई सब्जी बेच रहा है तो कोई कबाड़ी का काम कर रहा है तो कई काम की तलाश कर रहा है। वहीं 90 प्रतिशत परेशान बस संचालकों का कहना है कि वे अपनी सभी बसें बेचना चाहते हैं मगर परिस्थितियां ऐसी हैं कि अब कोई खरीददार भी नहीं मिल रहा है।
भास्कर ने बुधवार के अंक में खबर प्रकाशित कर बताया था कि एसोसिएशन के अध्यक्ष धर्मेंद्र वर्मा ने 47 में से 27 बसें बेच दी हैं, जबकि एक ने बस बेचकर ढाबा खोल लिया है। इससे जुड़े 500 लोग अब कर्ज लेकर जिंदगी जी रहे हैं। बुधवार को इनमें से कुछ बस संचालक और सामने आ गए। हालांकि कई अभी भी अपना नाम उजागर नहीं करना चाहते पर दबी जुबान से सभी बताते हैं कि वे सड़कों पर आ गए हैं।

गाडि़यों को सड़कों पर उतारने एक लाख का मेंटेनेंस खर्च: अभिषेक
मां उमिया ट्रैवल्स के संचालक 7 गाड़ियाें के मालिक अभिषेक पटेल का कहना है कि जब इन गाड़ियों को दोबारा सड़कों पर उतारेंगे तो करीब एक लाख रुपए तक मेंटनेंस खर्च आएगा। लाॅकडाउन भी खत्म हो जाएगा, फिर भी सड़कों पर सवारियां नहीं मिलेंगी। ऐसे में गाड़ियां चलाने से नुकसान और अधिक होगा, दिसंबर तक ये हालात नहीं सुधरने वाले, ऐसे में बसों को बेचना जरूरी हो गया है।

बस खड़ी कर ढाबा चलाया उसमें भी नुकसान: लखन पटवा
महामाया ट्रैवल्स कंपनी के संचालक लखन पटवा का कहना है कि 7 गाडियों का मालिक तो हूं मगर गाड़ियां खड़ी कर 45 दिनों से ढाबा चला रहा हूं। कोरोना के चलते हाॅटल व्यवसाय भी चौपट हो गया है। ऐसे में ढाबा खोलने के लिए दो लाख रुपए का लिया कर्ज भी अब चुका पानेकी स्थिति में नही हूं। उन्होंने कहा-मेरेपास बसों को बेचने के अलावा अब कोई चारा नहीं है।

बसें खड़ी रखना सफेद हाथी पालने जैसा: मानस ठाकुर
माॅ अंबे ट्रैवल्स के संचालक मानस ठाकुर ने कहा सभी गाड़ियों की बीमा अवधि समाप्त हो गई, फिर से बीमा कराना है मगर फाइनेंस की हुई गाड़ियों की किस्तें पटाने के लिए पैसे नहीं है तो बीमा कराने के लिए पैसे कहां से लाएं। दूसरा कोई रोजगार नही है, घर चलाने के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो 5 लाख रुपए ब्याज पर लिए हैं। बसें खड़ी हैं, कोरोना काल में बसों को रखना सफेद हाथी पालने जैसा है इसलिए इन्हें बेचना ही आखिरी विकल्प है।

कर्ज लेकर घर चला रहे हैं: श्याम
मां दुर्गा ट्रैवल्स के संचालक 4 गाडियों के मालिक श्याम सुन्दर साहू का कहना है कि दिसंबर से पहले स्थिति सामान्य होने वाली नहीं है। साढे तीन माह में ही हालात बद से बत्तर हो गए हैं तो अगले और 5 महीनों में हमारी क्या स्थिति हो सकती है यह भगवान ही जानता है। घर चलाना था, गाड़ियों की किस्तें पटाना था, 4 लाख रुपए ब्याज पर लिए थे, वह भी खर्च हो गए।

जो 15 सालों में कमाया था साढ़े तीन माह में गंवा दिया
बस एसोसिएशन के अध्यक्ष धर्मेंद्र वर्मा का कहना है कि 27 बसों को बेचने के बाद भी मुझे 25 लाख में अपनी जमीन बेचनी पड़ी। 15 सालों में हमने जो कमाया था वो 4 महीनों में गंवा दिया। खरीदार मिले तो जो बसें बची हैं उन्हें भी बेच दूंगा। उन्होंने कहा कि प्रशासन संचालकों, कर्मचारियों की मदद करें, साथ ही अगले 3 माह के टैक्स में भी छूट दें। हमने संयुक्त कलेक्टर अरविंद पाण्डेय से टैक्स में छूट देने सहित कर्मचारियों को आर्थिक मदद और रोजगार देने की मांग की है।

दूसरे रोजगार के लिए बैंकों से नया लोन भी नहीं मिलेगा
11 बसों के मालिक शिवानी बस ट्रैवल्स के संचालक प्रकाश शर्मा का कहना है कि किस्तें पटाने के लिए सरकार की ओर से 6 माह की छूट मिली थी वह भी खत्म होने वाली है। किस्तें पटानी है, बसों की बीमा अवधि भी खत्म हो गई, अब फिर से बीमा कराना है। बसों के लिए लिया लोन पटा नहीं है तो नए रोजगार के लिए बैंकों से नया लोन भी नहीं मिलेगा। इसलिए बस संचालकों के पास बसों को बेचने के अलावा कोई विकल्प नही है।
कोरोना से नहीं, बेरोजगारी से डर लगता है...
बसों में काम करने वाले इश्राफिल खान, संतोष यादव, सुरेश साहू, रमेश चन्द्राकर जैसे ड्राइवरों का कहना है कि हमने जीवनभर लोगों को मंजिलों तक पहुंचाया पर आज हमारी खुद की जिंदगी मंजिल से भटक गई है। साढ़े तीन माह से बसें खड़ी हैं, हाथ खाली हैं, अब कोरोना से नहीं साहब बेरोजगारी से डर लगता है। हर मिलने वालों से हम यही गुजारिश करते हैं कि देखना भाई साहब हमारे लायक कोई काम होगा तो बताना...

15 दिन में 7.5 लाख खर्च, भाड़ा मिला 23 हजार
लाॅकडाउन से साढ़े तीन माह पहले लगभग 25 ट्रैवल कंपनियो‌ं के बस संचालक 120 बसें चला रहे थे। 15 दिन पहले ही 10 बसों को सड़कों पर फिर से उतारा था मगर इन 15 दिनों में प्रत्येक गाड़ी 5 हजार की दर से 10 गाडियों के पीछे साढ़े सात लाख रुपए खर्च आया था। इस दौरान किसी बस ने हजार कमाए तो किसी ने 1500 ही। साढ़े सात लाख खर्च कराने के बाद चलने वाली सभी बसों से भाड़े के रूप में 23 हजार ही मिले, यानी सवा सात लाख घर से गए।



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