10 दिन भी नहीं लहराया तेलीबांधा का सबसे ऊंचा तिरंगा, हर हफ्ते फहराने खर्च 6600 रुपए , August 15, 2020 at 06:00AM

राजधानी और शहर का प्रतीक रूप तेलीबांधा का सबसे ऊंचा तिरंगा पूरे कोरोना काल में कुल जमा दस दिन भी नहीं लहराया है। 18 मार्च को शहर में पहला मरीज मिलने के बाद फिर लगातार लॉकडाउन के चलते इक्का-दुक्का दिन ही तिरंगे को यहां के 80 मीटर ध्वज खंभे पर चढ़ाया गया। भास्कर टीम को पड़ताल में ये जानकारी मिली है।
इस साल जनवरी में गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी के ठीक तीन दिन पहले इसमें तकनीकी खराबी आ गयी थी। काफी मशक्कत के बाद करीब दस लाख रुपए खर्च कर इसके उलझे तारों को सुलझाया गया। हर दिन तिरंगा लहराए इसके लिए नगर-निगम में दो अलग-अलग आकार के करीब 14 लाख में एक दर्जन बड़े झंडे लेने का प्रस्ताव भी बनाया गया।
जिसके बाद तीन झंडे खरीदे भी गये, लेकिन नियमित रूप से यहां कभी भी तिरंगा लहराते नहीं दिखा। यहां तक कि तालाबंदी के पहले से फरवरी के महीने में भी नियमित रूप से तिरंगा यहां नहीं लहरा रहा था। निगम के पास फिलहाल दो साइज में पांच झंडे हैं। खुले आसमान के नीचे इतने बड़े आकार के झंडे को गर्मी और बरसात के मौसम में सबसे ज्यादा खतरा होता है। कई बार ऐसे मौसम में खंभे के तार भी उलझ जाते हैं। अक्सर यहां इतनी ऊंचाई पर बारिश या खराब मौसम में तिरंगा नहीं लहराया जाता है। 26 जनवरी से पहले यहां मौसम खराब होने की सूरत में झंडे को कोई क्षति न हो इसके लिए एक नया सिस्टम भी बनाया गया। इसमें एक वैकल्पिक तार और लगाया गया था ताकि अगर मूल तार उलझते हैं या खराब होते हैं ताे उनको फौरन बदलना जरूरी नहीं होगा। यही नहीं अतिरिक्त तार होने की वजह से तार बदलने के दौरान तिरंगे को खंभे से उतराने की जरूरत भी नहीं होगी। पिछले साल ही निगम ने तेलीबांधा में तिरंगे झंडे के रखरखाव के लिए नई कंपनी से अनुबंध किया है।

एक बार तिरंगा चढ़ाने उतारने का खर्च 2200 रुपए
तिरंगे को 80 मीटर की ऊंचाई पर एक बार चढ़ाने या उतारने का खर्च करीब 2200 रुपए आता है। एजेंसी के जरिए निगम ठेका देकर ये काम करवाता है। तिरंगे को हफ्ते में तीन बार चढ़ाने उतारने में करीब 6600 रुपए खर्च हो जाते हैं। इस लिहाज से साल भर में साढ़े तीन लाख रुपए केवल तिरंगे को चढ़ाने उतारने में खर्च होते हैं।



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