आजादी से पहले के 8 दशक को सहेजे स्वर्णिम इतिहास के पन्नों से "याद करो कुर्बानी" , August 15, 2020 at 06:08AM

राजधानी की जेल में रखे करीब एक सदी पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज ऐसी धरोहर है जिनमें ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की जेल यात्रा के दिन और तारीखें दर्ज हैं। ये पन्ने राजधानी-प्रदेश के लोगों के जुझारूपन के भी गवाह हैं। 74वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इतिहास के उन्हीं पन्नों से निकली कुछ जानकारियां, ताकि मौजूदा पीढ़ी को वो नाम और बातें पता चलें जिनकी वजह से रायपुर आजादी के इतिहास में अमर हो गया।

शहीद वीरनारायण : प्रदेश के प्रथम सेनानी थे। 1857 में जेल से भागकर अंग्रेजों से लोहा लिया। रायपुर के जयस्तंभ चौक पर फांसी दी गई।
पं. रविशंकर शुक्ला: राष्ट्रीय नेताओं से सीधा संपर्क बनाया। उनके साथ मिलकर गांधीवादी विचारधारा के साथ आंदोलन की कमान संभालीl
महादेव प्रसाद पांडेय : बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े थे। देश के पहले स्वतंत्रता दिवस पर वह लाल किले पर मौजूद थे।
डॉ खूबचंद बघेल : पूरे छतीसगढ़ के किसानो को एकजुट किया और किसानों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन छेड़ा।
ठाकुर प्यारेलाल सिंह : राजनांदगांव से रायपुर आकर मज़दूर-किसानों को एकजुट कियाl उनकी मांगों की आड़ में आंदोलन छेड़ दिया।
पं. सुंदरलाल शर्मा : कंडेल नहर सत्याग्रह और सिहावा जंगल सत्याग्रह में भाग लिया। 1925 में राजिम मेले में अछूतों काे प्रवेश दिलाया। छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से जाने गए।
पं. माधवराव सप्रे : रायपुर में 1900 में उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। राजधानी-प्रदेश में स्वतंत्रता आंदोलनों के सूत्रधार माने जाते हैं।
वामनराव लाखे : रायपुर में 1925 में होमरुल की स्थापन की। 1920 में असहयोग आंदोलन और 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी निभाई।
बैरिस्टर छेदीलाल : असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा, व्यक्तिगत सत्याग्रह, तथा भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और कई आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
छोटेलाल श्रीवास्तव : कंडेल सत्याग्रह के सूत्रधार थे। उनका घर धमतरी में स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख केंद्र रहा। 1918 में धमतरी में राजनीतिक अभियान की अगुवाई की।

बैरकपुर सैन्य क्रांति जैसा विद्रोह यहां भी
वीर नारायण सिंह के बलिदान के बाद रायपुर ने भी बैरकपुर की तरह की सैन्यक्रांति देखी। इसके जनक तीसरी रेजिमेन्ट के सैनिक हनुमान सिंह थे। हनुमान सिंह ने 18 जनवरी 1858 को सार्जेन्ट मेजर सिडवेल की हत्या की और अपने साथियों के साथ तोपखाने पर कब्जा कर लिया। सूचना पर पहुंचे लेफ्टिनेंट रॉट और लेफ्टिनेंट सीएच लूसी स्मिथ ने विद्रोह पर काबू पा लिया। हनुमान सिंह और 17 साथी 6 घंटे तक लड़े, फिर फरार हो गए।

क्रांतिकारियों के लिए ही बनी रायपुर जेल
अंग्रेजी हुकूमत ने 1857 के तुरंत बाद रायपुर जेल का निर्माण शुरू किया और 1862 में इसे तैयार किया। इसके बाद से यहां क्रांतिकारियों को कैद करना शुरू कर दिया गया। जेल डीआईजी डॉ केके गुप्ता के मुताबिक उनके पास केवल 802 सेनानियों का रिकार्ड है। आंदोलनकारी कहीं ज्यादा थे। नागपुर और जबलपुर समेत कई अलग-अलग जेलों में बंद हुए। उनका रिकार्ड रायपुर में नहीं है।

रायपुर का सबसे बड़ा सूर कांस्पिरेसी केस
निखिल सूर, परसराम सोनी, सुधीर मुखर्जी और विपिन बिहारी की टीम अंग्रेजों पर हमले के लिए बम बनाती थी। इस काम में प्रेमचंद वासनिक, डॉक्टर सुरमंगल मिस्त्री, सुधीर मुखर्जी, दशरथ चौबे, गिरिवर दामोदर आदि ने सहयोग किया था। मुखबिरी से पूरी टीम पकड़ी गई और मामला खुला तो अंग्रेज अफसर हैरान रह गए। सूर कांस्पेरिसी के नाम से यह बड़ा केस चला और चारों ही काफी समय तक जेल में रहे।

जेल की दीवार उड़ाने की कोशिश में फंसे
पं. जयनारायण पांडे ने श्रीनाथ मामा के साथ हलवाई लाइन मंदिर के गुम्बद के नीचे बम बनाया और जेल उड़ाने की कोशिश की। उग्र विचारधारा के समर्थक बिलख नारायण के नेतृत्व में योजना बनाई थी। अंग्रेज़ों ने बम का सामान इकट्ठा करने और वारदातों में शामिल रहने के आरोप में पकड़ लिया गए। साथ ही पांडे को स्कूल से अंग्रेजी झंडा उतारने के आरोप में जेल भेजा गया था।

ब्रिटिश हुकूमत में मिलिट्री कर्नल को जेल का जिम्मा
बरतानिया यानी ब्रिटिश हुकूमत में मिलिट्री के कर्नल को जेल की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती थी। अंगेज़ों का मानना था क्रांतिकारियों को जेल में यातनाएं देकर ही आज़ादी के आंदोलन को कुचला जा सकता हैंl रायपुर सेंट्रल जेल में अब भी कुछ निशान मौजूद हैं जो जेल में क्रांतिकारियों को दी जाने वाली यातनाओं की याद दिलातें हैं। इनमें फांसी की बैरक भी शामिल हैं।

जिन्होंने आजादी के लिए जेल में लंबा समय गुजारा
बृजलाल बियाणी, शंकर तिवारी, पीवी गोले, शिवदास डागा, क्रांति कुमार, जती जतनलाल, भगवती प्रसाद, ठाकुर लक्ष्मणसिंह, भीमराव, रतिलाल, शिवाजी पटवर्धन, पुरुषोत्तम देशपांडे, डीएम दामले, महादेव पारसनीस, नारायण मेघावाले, चतुर्भुजभाई विट्ठदास, आनंदराव , क़ासिम खान, रघुनाथ पंडित, लक्ष्मण मराठे, हरिहर देशपांडे, मोहनलाल प्रेमसुख, परसराम जोगलेकर, डीव्ही सोमन, गणेश भोजराज, केशव लेले, सुंदरलाल प्रयागदास, बालमुकुंद रामगोपाल, माधव पंडित, गोपलराव, अनंतराम हिचराम, लक्ष्मीनारायण महानी, महादेव मनोहर, विश्नाथराव तामस्कर, जगन्नाथ पटवर्धन, आबामाकडे माकड़े, वल्ल्भदास भीकमचंद, महादेव जोगलेकर, मुरेश्वेर दामले, गणपत लाल पांडे, लक्ष्मण विठ्ठल देशमुख, नयनदास, जगन्नाथ बघेल, पशुदास, महंत पूर्णदास, जमुनालाल चोपड़ा, सेठ मोहनलाल, मूलचंद, केएल गुमाश्ता, एमआर आवारी, प्रभुराम सावl

नंदकुमार दानी: प्रतिबंध के बावजूद अंग्रेज़ों के खिलाफ रायपुर में जुलूस निकाला और जमकर नारेबाजी की गई। दानी जेल भेज दिए गए।

कमलनारायण शर्मा : हुकूमत का विरोध करते-करते अंग्रेज अफसर से उलझ गए थे। उन्हें रायपुर जेल भेज दिया गया और मुकदमा चलाया गया।

पांडुरंग डोनगांवकर : दुर्ग के रायपुर में एक रिश्तेदार के घर आकर रहे और आजादी के आंदोलनों में शामिल होते रहे। गिरफ्तार कर लिए गए।

शीतल प्रसाद मिश्रा : भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय हिस्सदारी निभाईl अंग्रेजी सरकार के प्रतिबंध के बावजूद रैलियां निकली और जेल भेजे गए।

महंत लक्ष्मीनारायण शुक्ला : गांधीवादी विचारधारा के समर्थक थेl भारत छोड़ो और सविनय अवज्ञा जैसे कई आंदोलनों में शामिल रहेl

संकलन: मोहम्मद निजाम और कौशल स्वर्णबेर
डिजाइन: प्रवीण खानदोरे



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