अयोध्या में श्रीराम के मंदिर से पहले छत्तीसगढ़ में तैयार हो जाएंगे चंदखुरी में मां कौशल्या और तुरतुरिया में लव-कुश के तीर्थस्थल , August 05, 2020 at 05:49AM

कौशल स्वर्णबेर | भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में 5 अगस्त को श्रीराम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन होगा। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम से जुड़ी उन सभी बातों का एक बार फिर जिक्र शुरू हो गया है जिनका उनसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से वास्ता रहा। माना जा रहा है कि अयोध्या में मंदिर निर्माण से पहले छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार भगवान राम से जुड़े प्रमुख स्थलों को विकसित करने की तैयारी कर रही है। इसमें सबसे पहले चंदखुरी में माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर शामिल है। इसे पौराणिक कथाओं जैसा विकसित किया जाएगा। वहीं, तुरतुरिया के वाल्मीकि आश्रम में उनके दोनों पुत्र लव व कुश का जन्मस्थल भी तीर्थस्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। इसी तरह बस्तर के रामपाल और रामाराम को भी संवारने की प्लानिंग हो चुकी है। छत्तीसगढ़ के वे सभी स्थान ऐतिहासिक तीर्थ के रूप में विकसित किए जाएंगे जहां से श्रीराम ने वनवास काल के दौरान समय बिताया था।

इसे राज्य सरकार पौराणिक कथाओं की तरह बनाने जा रही है। बीते 22 दिसंबर को कौशल्या मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए भूमि-पूजन किया गया था। इसके साथ ही राम वन गमन पथ पर पड़ने वाले स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की परियोजना की भी शुरुआत कर दी गई थी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 29 जुलाई को सपरिवार चंदखुरी पहुंचकर मंदिर में पूजा की थी। लंका कूच से पहले जिस तरह रामेश्वरम् में भगवान राम ने शिवलिंग स्थापित कर पूजा-अर्चना की थी, उसी तरह उत्तर से दक्षिण भारत में प्रवेश से पहले उन्होंने छत्तीसगढ़ के रामपाल नाम की जगह में भी शिवलिंग स्थापित कर आराधना की थी। रामपाल बस्तर जिले में स्थित है, जहां प्रभु राम द्वारा स्थापित शिवलिंग आज भी आस्था का केंद्र है। दक्षिण प्रवेश से पूर्व प्रभु राम ने रामपाल के बाद सुकमा जिले के रामाराम में भूदेवी की आराधना की थी। इन दोनों स्थलों को भी नए पर्यटन सर्किट में शामिल कर उनके सौंदर्यीकरण और विकास की योजना तैयार कर ली गई है।

पूरे शरीर पर राम नाम गुदवाता है रामनामी समुदाय
भगवान श्रीराम के प्रति आस्था रखने वाला एक संप्रदाय है रामनामी। इसके अनुयायी जांजगीर और रायगढ़ जिले में देखे जा सकते हैं। इस समुदाय के लोग पूरे शरीर पर राम नाम गुदवाते हैं।

छत्तीसगढ़ बिना पूरी नहीं होती राम कथा क्योंकि....
ये माता कौशल्या की जन्मस्थली है

ननिहाल- छत्तीसगढ़ को भगवान राम की माता कौशल्या की जन्म भूमि होने के कारण कौसल प्रदेश कहा जाता है। माता कौशल्या को लोग बहन मानते हैं और भगवान श्रीराम को भांजा। आज यहां भांजे के पांव छुए जाते हैं।
शृंगी ऋषि के यज्ञ से उत्पन्न हुए
जन्म कारक- यहां शृंगी ऋषि आश्रम है। इनके यज्ञ के बाद ही राजा दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न प्राप्त हुए। दशरथ की दत्तक पुत्री शांता शृंगी ऋषि की पत्नी थीं।
12 साल वनवास बिताया, दैत्य संघारे
प्रशिक्षण- श्रीराम ने वनवास के 12 साल आज के छत्तीसगढ़ और तब के दण्यकारण्य या दक्षिण कौशल में बिताए। इस दौरान श्रीराम ने राक्षसों का वध किया साथ ही ऋषियों से कई विषयों की जानकारी भी ली।
शबरी के जूठे बेर यहीं खाए थे
समरसता- वनवास के दौरान जिस शबरी के घर राम पहुंचे थे वो अब शबरीधाम कहलाता है। यहीं भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे। शिवरीनारायण में भगवान श्रीराम और शबरी के मंदिर हैं।

वनवास के दौरान सरगुजा के सीतामढ़ी-हरचौका से किया था छत्तीसगढ़ में प्रवेश

  • जानकारों के अनुसार भगवान श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में सरगुजा जिले के सीतामढ़ी-हरचौका से प्रवेश किया था।
  • यहां से सीतामढ़ी घाघरा फिर घाघरा से कोटाडोल पहुंचे। यहां से नेउर नदी तट पर बने छतौड़ा पहुंचे, जहां भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने पहला चातुर्मास बिताया।
  • इसके बाद छतौड़ा आश्रम से देवसील होकर रामगढ़ की तलहटी से होते तीनों सोनहत पहुंचे। फिर बैकुंठपुर होते पटना-देवगढ़ आए फिर सूरजपुर और विश्रामपुर होते अंबिकापुर पहुंचे।
  • फिर महानदी तट से चलते हुए ओडगी पहुंचे। यहां सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफा में दूसरा चातुर्मास बिताया।
  • इसके बाद तीनों लक्ष्मणगढ़ पहुंचे। फिर महेशपुर में ऋषियों का मार्गदर्शन लेते चंदन मिट्टी गुफा पहुंचे। रक्सगंडा में राक्षसों का वध किया। फिर किलकिला में तीसरा चातुर्मास बिताया। इस तरह सरगुजा व जशपुर क्षेत्र में तीन साल बिताए।

तुरतुरिया में वाल्मीकि आश्रम जहां पैदा हुए लवकुश
दूधाधारी मठ के प्रमुख महंत राम सुंदर दास बताते हैं कि भगवान श्रीराम का ननिहाल रायपुर से 40 किलोमीटर दूर चंदखुरी गांव है। इसे माता कौशल्या की नगरी कहा जाता है। माना जाता है कि माता कौशल्या ने यहीं जन्म लिया था। यहां माता कौशल्या का एकमात्र प्राचीन मंदिर है। कसडोल में तुरतुरतिया पहाड़ है जहां वाल्मिकी का आश्रम है। वही आश्रम जहां माता सीता भगवान राम द्वारा त्याग किए जाने के बाद समय बिताया था। यहीं माता सीता और भगवान राम के पुत्र लव व कुश का जन्म हुआ था। यहां पर लव के नाम से लवन और कुश के नाम से कसडोल का नामकरण हुआ। वनवास के दौरान श्रीराम विश्रवा, शरभंग, वशिष्ठ, मार्कंडेय, सुतीक्ष्ण, दंतोली, रक्सगंडा, वाल्मिकी, लोमस, अत्रि, कंक, श्रृंगी, अंगिरा, गौतम, महरमंडा आदि ऋषियों से मिले।



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प्रस्तावित कौशल्या माता मंदिर।


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