कीचड़ व गंदगी से घिरा एक कमरा, ऐसी आंगनबाड़ियों में तीन घंटे रहना मुश्किल, तीन साल कैसे पढ़ेंगे बच्चे , August 09, 2020 at 06:07AM

ठाकुरराम यादव/मनोज व्यास/सुधीर उपाध्याय | केंद्र की नई शिक्षा नीति में आंगनबाड़ी केंद्रों प्री-प्राइमरी स्कूल के रूप में विकसित करने और बच्चों को 3 साल की पढ़ाई यहीं करवाने का प्रस्ताव है। क्या आंगनबाड़ियां इस लायक हैं, यह जानने के लिए भास्कर टीम ने राजधानी ही नहीं, बल्कि सौ किमी दायरे में दर्जनभर से ज्यादा आंगनबाड़ी केंद्रों का जायजा लिया और पाया कि कोई केंद्र घुरवा (कंपोस्ट पिट) के ठीक सामने है, कहीं दरवाजे ही ऊंची-ऊंची घास से ढंक गए हैं। एक छोटे से कमरे में चलने वाले इन केंद्रों में 4 से 6 साल तक के बच्चे रुकना पसंद नहीं करते। बाहर निकलते हैं लेकिन खेलने के लिए न तो आंगन है और न ही बाड़ी। शहर में तो अधिकांश केंद्र किराए के जर्जर कमरों में चल रहे हैं। कोराेना की वजह से लॉकडाउन के कारण आंगनबाड़ी केंद्र बंद हैं। बच्चों का भोजन घर पहुंचाया जा रहा है। भास्कर टीम पुराना धमतरी रोड पर कोलर गांव के आंगनबाड़ी केंद्र-3 पर पहुंची तो दरवाजे के सामने ही गंदे पानी की नाली बह रही थी। मवेशी बंधे थे और खेलना तो दूर, आने-जाने की जगह नहीं थी।


कोलर में ही हाईस्कूल के पीछे आंगनबाड़ी केंद्र-1 है। वहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रीना ध्रुव ने बताया कि कांव से दूर होने की वजह से लोगों को मनाना पड़ता है, तब जाकर वे बच्चों को भेजते हैं। कोलर के बाद सारखी और बिरोदा में आंगनबाड़ी केंद्र बंद मिले। अभनपुर के आंगनबाड़ी केंद्र-5 के सामने गिट्‌टी का ढेर लगा था।

पहुंचने का रास्ता भी नहीं
यहां से टीम कुरूद ब्लॉक में चटौद गांव पहुंची। वहां आंगनबाड़ी केंद्र की दीवार पर मिकी माउस, मोटू-पतलू, छोटा भीम आदि कार्टून कैरेक्टर की तस्वीरें थीं, लेकिन सामने मैदान पर कीचड़ था। मवेशियों का गोबर फैला हुआ था। चटौद के ही केंद्र दो के सामने सफाई नहीं दिखी। बेलटुकरी के आंगनबाड़ी केंद्र-3 के सामने तो घास और झाड़ियां उग आई हैं। चलने के लिए साफ रास्ता भी नहीं है। राजिम पुल पार करने के बाद गरियाबंद जिला आता है। यहां देवरी गांव में तो घुरवा के पास आंगनबाड़ी केंद्र बना दिया गया है। बच्चों को घुरवा से होकर जाना पड़ता है।


किराए से कमरे नहीं मिलते
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संघ की अध्यक्ष भुवनेश्वरी के मुताबिक शहर में भवन नहीं होने के कारण किराए पर केंद्र चलाए जा रहे हैं। छोटे बच्चों के कारण लोग कमरा किराए पर देने से आनाकानी करते हैं। किराए की राशि भी पर्याप्त नहीं है। इस वजह से छोटे कमरों में केंद्र चलाने की मजबूरी होती है। कई तो ऐसी जगह हैं, जहां बच्चों के खाने या खेलने तो दूर बैठने में भी परेशानी होती है। यहां किसी तरह बच्चों के लिए पढ़ाई व अलग-अलग एक्टिविटी कराई जाती है।

मनरेगा के पैसों से निर्माण
राज्य सरकार ने एक आंगनबाड़ी केंद्र के लिए 6.45 लाख की राशि तय की है, लेकिन सभी जगह एक ही आकार के भवन नहीं हैं। गांव में मनरेगा से 5 लाख और महिला एवं बाल विकास विभाग से 1.45 लाख से आंगनबाड़ी केंद्र बनाए जा रहे हैं। इसमें भी विभाग के सचिव ने तीन हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी भवन और शौचालय निर्माण नहीं होने पर नाराजगी जताई थी। मनरेगा के अभिसरण से 9 हजार से ज्यादा भवनों के निर्माण कार्य चल रहे हैं।

नई केंद्रीय शिक्षा नीति में आंगनबाड़ियां महत्वपूर्ण

  • तीन साल की आंगनबाड़ी के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा।
  • प्री प्राइमरी स्कूल में तब्दील किए जाएंगे आंगनबाड़ी केंद्र।
  • प्री स्कूलिंग के साथ 5+3+3+4 फॉर्मूले में स्कूली पाठ्यक्रम।
  • प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा मुहैया कराई जाएगी।
  • आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा।


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अभनपुर आंगनबाड़ी का हाल।


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