घरों में रहकर प्रकृति का किया वंदन , August 31, 2020 at 06:12AM

रविवार को प्रकृति का वंदन, पूजन कर लोगों ने सनातन संस्कृति का अपना धर्म निभाया। साथ ही इस पूजन के माध्यम से नई पीढ़ी को भी इससे जुड़ने व अपनी संस्कृति को अक्षुण्य बनाए रखने प्रेरित किया गया। जिले के लोगों ने इस पूजन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

हिन्दू आध्यात्मिक, सेवा फाउंडेशन व पर्यावरण गतिविधि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पर्यावरण वन व संपूर्ण जीव सृष्टि के संरक्षण के लिए प्रकृति वंदन का आह्वान किया गया था। जिस कड़ी में रविवार को जिले में लोगों ने यह विधान पूरा किया। भारत में प्रमुख पर्वतों को देवताओं का निवास स्थान माना गया है। गाय, कुत्ता, चूहा, हाथी, शेर व यहां तक की विषधर नागराज को भी पूजनीय बताया है।

पहली रोटी गाय के लिए और अंतिम रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को आटा डालते हैं। चिड़ियों और कौओं के लिए घर की मुंडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। देवों के देव महादेव तो बिल्व-पत्र व धतूरे से प्रसन्न होते हैं। वट पूर्णिमा व आंवला ग्यारस का पर्व मनाया जाता है। मां सरस्वती को पीले पुष्प, धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को कमल और गुलाब के पुष्प अतिप्रिय हैं। गणेश जी दूर्वा से प्रसन्न हो जाते हैं।

प्रत्येक देवी-देवता भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति के विभिन्न अवयवों के संरक्षण का संदेश देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा का विधान इसलिए प्रारम्भ किया था कि गोवर्धन पर्वत पर प्रकृति की अकूत संपदा थी। मथुरा के गोपालकों के गोधन के भोजन-पानी की व्यवस्था उसी पर्वत पर थी। इस परंपरा को आज भी हम प्रकृति वंदन के रूप में बचा रखने के लिए सुबह 10 से 11 बजे के बीच पूजन कार्यक्रम किया गया। जिसमें लोगों ने अपने अपने घरों में लगे पेड़ों की पूजा कर प्रकृति का अभिनंदन किया।



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