पहले देर से आए मरीज, बाद में समय पर ऑक्सीजन नहीं मिली, 10 दिन में 77 लोगों की इसी वजह से गई जान , September 24, 2020 at 06:04AM

पीलूराम साहू | प्रदेश में पिछले 10 दिनों में कोरोना से 180 लोगों की मौत हुई है। इनमें 77 लोगों की आइसोलेशन यानी सामान्य वार्डों में जान इसलिए चली गई क्योंकि उन्हें गंभीर लक्षण थे, ऑक्सीजन और वेंटिलेटर सपोर्ट के साथ आईसीयू की जरूरत थी लेकिन आईसीयू नहीं मिला। इनमें ऐसे मरीज थे, जो निमोनिया, हाइपरटेंशन, हाइपोथायरायडिज्म जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। जिन मरीजों की जान आइसोलेशन वार्ड में गई, उनकी संख्या 43 फीसदी है। हैरानी की बात ये है कि सिर्फ सरकारी ही नहीं, बड़े निजी अस्पतालों के आइसोलेशन वार्डों में भी ऐसे लोगों ने दम तोड़ा, जिन्हें आईसीयू में भर्ती करने की जरूरत थी। भास्कर की पड़ताल में ऐसे कई केस सामने आए, जिन्हें आईसीयू में भर्ती किया जाता तो शायद उनका जीवन बच सकता था। गौतम विहार रायपुर के 67 वर्षीय मरीज को बुखार व सांस लेने में दिक्कत होने पर 19 सितंबर को एम्स में भर्ती कराया गया। उन्हें आइसोलेशन वार्ड में ही रखा गया और उसकी 22 सितंबर को मौत हो गई। दुर्ग के 54 वर्ष व्यक्ति को निमोनिया के साथ हाइपरटेंशन व डायबिटीज था। 21 सितंबर को उन्हें अंबेडकर अस्पताल में भर्ती किया गया और 22 सितंबर को उसकी मौत हो गई। दोनों मरीजों को गंभीर बीमारी होने के बाद भी सामान्य वार्ड में इलाज किया गया। इन मरीजों की तरह बाकी 75 मरीजों की भी जान आइसोलेशन वार्ड में गई है।

ऐसी हो रही लापरवाही

  • पहले तो मरीज जांच कराने में देर कर रहे है। कई लोग डर रहे कि जांच कराएंगे तो कोरोना निकल आएगा। इस वजह से बहुत सारे लोग समय पर जांच नहीं कर रहे।
  • फिर रिपोर्ट आने में देर हो रही। कई लोगों को रिपोर्ट मिलने में आठ से नौ और 10 दिन तक लग जा रहे हैं।
  • कई मरीजों को अस्पतालों में भर्ती करना चाहिए जहां व्यवस्था हो पर इसमें बड़ी चूक हो रही। सरकारी सेंटर में सामान्य इलाज के लिए भर्ती की जा रही है।
  • आइसोलेशन वार्ड में मरीजों को देखने और उनकी स्थिति का आंकलन करने में देर हो रही।

केस 1 - समय पर इलाज नहीं
रायपुर के अजय जान के पिता की मौत एम्स के आइसोलेशन वार्ड में हो गई। उनका आरोप था कि पिता के गुहार लगाने के बावजूद एम्स के डॉक्टरों ने समय पर इलाज नहीं किया और उन्हें आईसीयू में बेड तक नहीं दिया गया। इसलिए आइसोलेशन वार्ड में दम निकल गया।

केस 2 - बेड नहीं मिला
दुर्ग के रमेश कुमार के पिता अंबेडकर अस्पताल में भर्ती थे। उन्हें भी आईसीयू में बेड नहीं मिला। उनका आरोप था कि आईसीयू में बेड मिलता तो उनके पिता वेंटीलेटर में रहते। तो हो सकता है उनकी जान बच जाती। आईसीयू में बेड बढ़ना चाहिए।

10 दिन में 26926 मामले, इसलिए आईसीयू पैक
पिछले 10 दिन में रायपुर में 7298 समेत प्रदेश में 26926 कोरोना के मरीज मिले हैं। इन दिनों वायरल लोड बढ़ने के कारण ज्यादातर मरीजों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है। इस कारण एम्स, अंबेडकर अस्पताल समेत निजी अस्पतालों के आईसीयू में बेड खाली नहीं है। यही कारण है कि गंभीर मरीजों को भी सामान्य वार्ड में भर्ती कर इलाज करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना व हल्के के लक्षण वाले मरीजों को कोरोना केयर सेंटर व होम आइसोलेशन की सुविधा है। लेकिन जिन्हें सांस लेने में दिक्कत के साथ दूसरी गंभीर बीमारी है, उनका इलाज तो बड़े अस्पतालों में ही हो सकता है। भास्कर की पड़ताल में पता चला है कि जिन मरीजों की मौत आइसोलेशन वार्ड में हुई है, उन्हें आईसीयू की जरूरत थी। लगातार मरीज बढ़ने के कारण राजधानी के गिने-चुने निजी अस्पताल में ही बेड खाली है। बड़े व प्रतिष्ठित अस्पतालों में बेड पैक हो गए हैं। इस कारण कई गंभीर मरीजों को मजबूरन लौटाया जा रहा है।

तारीखवार आइसोलेशन वार्ड में मौत

तारीख कुल मौत एम्स अंबेडकर मौत(आइसोलेशन)
22 सितंबर 28 05 03 13
21 सितंबर 13 02 02 04
20 सितंबर 13 00 01 06
19 सितंबर 19 04 04 10
18 सितंबर 17 03 02 13
17 सितंबर 17 00 03 03
16 सितंबर 22 00 02 10
15 सितंबर 15 01 03 05
14 सितंबर 18 01 01 03
13 सितंबर 18 02 05 10
कुल 180 18 26 77


एम्स से ज्यादा अंबेडकर में मौत क्योंकि बेड व गंभीर मरीज ज्यादा
एम्स से ज्यादा अंबेडकर अस्पताल में मरीजों की मौत हो रही है। पड़ताल में पता चला कि एम्स की तुलना में अंबेडकर में आईसीयू व आइसोलेशन वार्ड में बेड ज्यादा है। एम्स की आईसीयू में महज 52 बेड है जबकि अंबेडकर में 150 से ज्यादा बेड है। इस कारण अंबेडकर में ज्यादा गंभीर मरीजों का इलाज हो रहा है। दोनों ही अस्पतालों में 500-500 बेड का दावा किया जा रहा है।

समय पर जांच कराएं तो कम हो सकती है मौतें : सिंहदेव
स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने बताया कि आइसोलेशन वार्ड में कोरोना मरीजों की मौत दुर्भाग्यजनक है। लोगों को थोड़ा जागरूक होना पड़ेगा। लक्षण दिखते ही अगर वे जांच करवाएं तो उनका इलाज समय पर शुरू होगा। ब्राड डेड भी दुर्भाग्यजनक है। क्योंकि ऐसे लोग समय पर जांच करा लेते तो उनकी जान बचाई जा सकती थी। पूरे ना सही आधे से ज्यादा लोग तो बच सकते थे। लोगों को चाहिए कि वह किसी भी सेंटर में जाकर जांच कराएं। अपना नाम, पता और मोबाइल नंबर सही दें। सैंपल देने के बाद मोबाइल नंबर बंद ना करें।


"गंभीर मरीजों की संख्या ज्यादा हो जाती है, तब बहुत कोशिश के बाद भी गंभीर मरीज को आईसीयू नहीं दे पाते। मजबूती में ऐसे मरीजों का इलाज आइसोलेशन वार्ड में करना पड़ता है।"
-डॉ. क्षिप्रा शर्मा, प्रभारी कोरोना वार्ड, अंबेडकर अस्पताल

"प्रदेश में गंभीर मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इस कारण आईसीयू लगभग फुल रहने लगे हैं। इलाज बेहतर करने का प्रयास चल रहा है। सरकार के निर्देश पर ऑक्सीजन बेड बढ़ा रहे हैं।"
- डॉ. सुभाष पांडेय, मीडिया प्रभारी कोरोना सेल



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राजधानी के अंबेडकर अस्पताल का कोविड वार्ड। (फाइल फोटो)


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