चार माह में ऑक्सीजन सिलेंडरों के दाम 15 से 35 रुपए तक बढ़ गए, शहर के अस्पतालों का दावा - रेट से उतना फर्क नहीं, सप्लाई कम होने से ज्यादा चिंता , September 23, 2020 at 06:31AM

जाॅन राजेश पाॅल | कोरोना काल में इस वक्त हजारों मरीजों के लिए प्रदेश में सबसे जरूरी चीज ऑक्सीजन (प्राणवायु) है, लेकिन छोटे अस्पताल उसी की कम सप्लाई की वजह से हांफने लगे हैं। अस्पतालों और ऑक्सीजन सप्लायरों का दावा है कि करीब दो माह पहले नागपुर से ऑक्सीजन लिक्विड की सप्लाई बंद हुई है, तब से राजधानी के अस्पतालों में ऑक्सीजन का संकट खड़ा हो गया है। यही नहीं, पिछले 4 माह में सिलेंडरों के दाम 15 से 35 रु. तक बढ़ाए जा चुके हैं। रेट के साथ-साथ सप्लाई में कमी से हालात चिंताजनक होने लगे हैं।
अस्पताल प्रबंधकों के अनुसार 24 अप्रैल को सिलेंडरों के दामों में वृद्धि को कंपनियों ने सालाना बढ़ोतरी बताकर 7 क्यूबिक मीटर वाले जंबो सिलेंडर के दाम 24 रुपए तक बढ़ा दिए। जबकि बी-टाइप सिलेंडरों में जिसमें 1.4 क्यूबिक गैस आती है, उसका मूल्य पहले 10 रुपए बढ़ा और दो हफ्ते पहले दोनों में 10 और 5 रुपए की वृद्धि कर दी गई। केवल राजधानी में ही 100-150 ऐसे अस्पताल है, जिनमें सिलेंडरों की मांग है। इस तरह एवरेज 5 से 6 हजार सिलेंडरों की रोज जरूरत पड़ रही है। नियमानुसार जहां मरीजों की भर्ती होती है वहां सिलेंडर रखना अनिवार्य है। इसलिए अब सरकार ने भी अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट लगाने की पहल शुरू की है। जानकारों की माने तो राज्य में जिस तरह कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं, यदि यही रफ्तार रही तो भविष्य में जीवनरक्षक सिलेंडरों की काफी कमी हो सकती है।

वेंटिलेटरों ने बढ़ाई जरूरत
डॉक्टरों और गैस सिलेंडरों बनाने वालों के मुताबिक सिलेंडरों की डिमांड ओटी में केसेस, वेंटी पर मरीजों की संख्या आदि से प्रतिदिन तय होती है। कोरोना के मरीजों को जब सांस लेने में तकलीफ होती है तब सिलेंडर लगाया जाता है। एक सिलेंडर 24 घंटे तक चल जाता है। लेकिन यदि मरीज वेंटीलेटर पर है तो इसकी खपत बढ़ जाती है, और एक सिलेंडर मात्र तीन चार घंटे अधिकतम चल पाता है क्योंकि उसे ज्यादा फोर्स से ऑक्सीजन देनी होती है। गैस सप्लाई लिमिट का परसेंटेज डाक्टर तय करते हैं।

प्रदेश में इसकी 17 कंपनियां
प्रदेश में ऑक्सीजन बनाने वाली 17 कंपनी हैं। रायपुर में लगभग चार-पांच कंपनी, भिलाई में एक मल्टीनेशनल कंपनी व एक निजी कंपनी, कोरबा में तीन कंपनियां ही गैस बनाने या लिक्विड सप्लाई करती है। बीएसपी गैस से संबंधित लिक्विड बनाकर एक बड़ी कंपनी को थोक में सप्लाई करती है। यहां से रीटेल सप्लाई की चेन है। हालांकि उस कंपनी के संचालक ने कोरोना काल में डिमांड व सप्लाई में आए अंतर को साझा करने से इनकार कर दिया। राजधानी के जानकारों के मुताबिक एम्स, अंबेडकर अस्पताल, रामकृष्ण, बालाजी और नारायणा आदि अस्पतालों में अपने लिक्विड टैंक व जनरेटर हैं, जिनसे वे ऑक्सीजन बनाते हैं।

रोज 400 सिलेंडरों की मांग
राजधानी में पचपेड़ीनाका के नामी निजी अस्पताल में गैस सिलेंडरों का काम देख रहे अफसर के मुताबिक उनके यहां कोरोना से पहले औसतन डेढ़ सौ सिलेंडरों की मांग थी, यह बढ़कर डबल हो गई है। फैक्ट्री वाले सप्लाई तो कर रहे हैं, लेकिन रेट बढ़ा दिया है। लालपुर के एक बड़े चैरिटी अस्पताल में भले ही लिक्विड टैंक है, लेकिन उन्होंने करीब 100 सिलेंडर खुद खरीद रखे हैं, ताकि इमरजेंसी में भरवाकर उपयोग कर सकें। अस्पताल एसोसिएशन से जुड़े पदाधिकारियों के मुताबिक शहर में अभी 400 सिलेंडरों की ज्यादा की जरूरत पड़ रही है।

घरों में ले जा रहे सिलेंडर
एक सर्जिकल कंपनी के संचालक की मानें तो कोरोना के बाद पूरे प्रदेश में ऑक्सीजन सिलेंडरों की जरूरत 200 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि सप्लाई 25 से 30 प्रतिशत ही है। घरों में होम आइसोलेशन की वजह से मांग अचानक बढ़ी है। उरेट के बारे में उन्होंने कहा कि इसका मामला बाद में आता है, सप्लाई ठीक नहीं रहना ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है।

नागपुर से सप्लाई बंद होने से फर्क था, अब कमी नहीं
असिस्टेंट ड्रग कंट्रोलर हीरेन पटेल ने माना कि कुछ समय पहले कमी थी, लेकिन अब ऑक्सीजन की सप्लाई में कहीं कोई कमी नहीं है। उन्होंने माना कि नागपुर से सप्लाई बंद होने से संकट आया था, लेकिन शासन के हस्तक्षेप के बाद कमी पूरी कर दी गई है। प्रदेश में 17 फैक्ट्रियां हैं, सभी पर नजर रखी जा रही है। सप्लाई मॉडल भी तैयार करके हर जगह नोडल अफसर बिठाए हैं। अब रेट बढ़ने व कमी की शिकायतों पर कार्रवाई होगी।

महंगा करने के पीछे ये तर्क
रायपुर के एक निजी सप्लायर लव केड़िया के अनुसार अब वे 100-150 सिलेंडर रोज की बजाए 400 सिलेंडर तक सप्लाई कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने ट्रांसपोर्टेशन के नाम पर प्रति सिलेंडर केवल 50 पैसे ही बढ़ाने की बात स्वीकार की। फैक्ट्री संचालकों का कहना है कि मजदूरों का वेतन बढ़ाना पड़ा है। सिलेंडरों को सेनिटाइज करके देना पड़ रहा है। ट्रांसपोर्ट में भी दिक्कतें हैं, इसलिए ज्यादा भाड़ा देना पड़ रहा है।



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फाइल फोटो।


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