राजधानी के थानों में 1600 से ज्यादा गाड़ियां सड़ रही, 2017 के बाद से नहीं हुई निलामी, पहिए तक गायब , September 03, 2020 at 06:01AM

प्रमोद साहू | हादसे तथा अलग-अलग केस जब्त की गई गाड़ियां थानों में रखी हैं और साल-डेढ़ साल में नीलामी का नियम है। लेकिन थानों में खुले में रखी गाड़ियां इतने ही समय में इस बुरे हाल में पहुंच रही हैं कि फिर कोई उसे खरीदना नहीं चाहता। इसका नतीजा ये हुआ है कि राजधानी के 32 थाना परिसरों का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं गाड़ियों के कबाड़खाने में तब्दील हो गया है। ट्रक से लेकर ट्रेलर तक और कारों से बाइक-साइकिलों तक, हजारों गाड़ियां इस तरह सड़ रही हैं कि जैसे इनसे ही जंगल उग आए हों। पुलिस का अनुमान है कि इस समय राजधानी और माना को मिलाकर सभी थानों में 1600 गाड़ियां कबाड़ की तरह पड़ी हैं और कोई इन्हें खरीदने वाला नहीं है। हालत ये है कि ये सभी गाड़ियों की तरह नहीं, बल्कि अब कबाड़ के रूप में भी मुश्किल से बेची जा सकती हैं।
भास्कर की पड़ताल के मुताबिक थानों में अलग-अलग केस और हादसों में जब्त होने वाली गाड़ियां जिला न्यायाधीश से अनुमति लेकर समय-समय पर नीलाम की जाती हैं। रायपुर में साल-डेढ़ साल में इन गाड़ियों की न्यूनतम दर तय करके नीलामी होती है, लेकिन इनकी हालत ऐसी है कि कोई खरीदने वाला नहीं मिल रहा है। भास्कर ने थाना परिसरों में जाकर गाड़ियों का जायजा लिया और इसी से स्पष्ट हुआ कि ये गाड़ियां क्यों नहीं बिक रही हैं।
गाड़ियों की नीलामी की जाती है। रायपुर ऐसा शहर है जहां हर एक-डेढ़ साल में गाड़ियों की नीलामी होती हैं। गाड़ियों की खुली नीलामी होती है, जिसमें बोली की न्यूनतम दर तय की जाती हैं। कई गाड़ियां इतनी कंडम हो जाती है कि उसकी बोली नहीं लग पाती हैं। दरअसल लगभग सभी थानों में 10 से 20 साल तक पुरानी गाड़ियां खड़ी हैं, जिनका अस्थि-पंजर ही सलामत है, बाकी पार्ट्स गायब हो गए। खासतौर पर इनमें बैटरियां नहीं हैं। अधिकांश के चक्के गायब हैं तो दूसरे छोटे-छोटे उपकरण, जिनकी लोगों की जरूरत पड़ती रहती है। पुलिस अफसरों ने बताया कि 2017 में 20 गाड़ियों की नीलामी की गई थी, जिसमें 1998 की 4 गाड़ियां थीं। उसके बाद एक-दो बार प्रक्रिया हुई, लेकिन न तो गाड़ी लेने के लिए मालिक आए और न ही खरीददार।

खुले में कबाड़, जंगल सा नजारा
शहर के अधिकांश थानों में जब्त गाड़ियों को रखने का इंतजाम नहीं है। ये थाना परिसर के कोने में कबाड़ की तरह रखी जाती हैं। शहर के सभी थानों में ऐसी गाड़ियां खुली रखी हैं और मौसम की मार से घास-फूस और पौधों से घिर गई हैं। दूर से तो जंगल-झाड़ियां ही दिखती हैं, पास जाने पर ही पार्ट्स नजर आते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार जब्त गाड़ियां ऐसी जगह रखनी हैं, जहां इन्हें मौसम से बचाया जा सके। यही नहीं, गाड़ियों पर जब्ती से लेकर केस और मालखाने का नंबर होना चाहिए। जिस हाल में जब्त हुईं, वैसी ही रहनी चाहिए यानी पार्ट्स सलामत होना चाहिए। अगर कुछ चोरी होता है, तो वह थाने की जिम्मेदारी हैं। गाड़ियों की जो हालत है, वही बताती है कि इन गाइडलाइंस का पालन किस तरह किया जा रहा है।

क्या है नीलामी का नियम
लावारिस गाड़ियों को 28 पुलिस एक्ट के तहत नीलामी के लिए जिला न्यायाधीश से अनुमति ली जाती हैं। इसकी एक प्रक्रिया है, उसे पूरा करना होता है। उसके बाद इश्तिहार जारी करके दावा-आपत्ति बुलाते हैं। फिर विज्ञापन जारी कर गाड़ी नीलाम होती है। इसमें शामिल होने के लिए न्यूनतम दर का बैंक ड्राफ्ट लगता है। न्यूनतम दर से ही बोली लगना शुरू होता है।

राजधानी के थानों में इसलिए कबाड़

  • हादसे में किसी की मौत होने पर परिजन अशुभ मानकर नहीं ले जाते।
  • कई बार एक्सीडेंट में मृत लोगों के वारिसों का ही पता नहीं चलता।
  • जांच के दौरान पकड़ी गई चोरियों के गाड़ी का ब्योरा नहीं मिल पाता।
  • चोरियों की गाड़ियों में नंबर प्लेट से लेकर चैसिस नंबर तक बदला है।
  • दूसरे राज्यों के गाड़ियों के मालिक नहीं आ पाते, इसलिए खड़ी हुई हैं।
  • गांजा, शराब या नारकोटिक्स के मामलों फैसला आने में वक्त लगता है।
  • गाड़ियों का दस्तावेज नहीं होने के कारण भी ये थानों में पड़ी रह गई हैं।
  • एक्सीडेंट में गाड़ी की इतनी क्षति हो जाती है कि मालिक नहीं ले जाता।

(विजय अग्रवाल, आईपीएस और एवं एक्सपर्ट)

"गाड़ियों को कोर्ट के आदेश से हर साल नीलाम किया जाता है। ज्यादातर चोरी की गाड़ियां ही थाने में खड़ी है। इनके रखरखाव की व्यवस्था करेंगे।"
-अजय यादव, एसएसपी रायपुर
"कोई गाड़ी अगर 6 माह खड़ी है यानी स्टार्ट नहीं की गई तो वह खराब ही होती है। इंजन बैठ जाता है। धूप, बारिश, ओस से भी नुकसान होता है।"
-मीत पटेल, गाड़ी मैकेनिक



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तस्वीर तेलीबांधा थाने की।


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