राजधानी में आईसीयू-ऑक्सीजन की जरूरत वाले रोजाना 250 मरीज, पर ऐसे बेड सिर्फ 550 ही , September 12, 2020 at 06:58AM

पिछले एक हफ्ते से राजधानी में रोजाना औसतन 800 से ज्यादा कोरोना मरीज मिल रहे हैं। इनमें से अलग-अलग अस्पतालों में लगभग 250 मरीज ऐसे पहुंच रहे हैं, जिन्हें या तो आईसीयू की जरूरत है या बेड पर आक्सीजन की। राजधानी में सरकारी-निजी सब मिलाकर आईसीयू वाले बेड 200 ही हैं, जिनमें वेंटिलेटर भी है। आक्सीजन की सुविधा वाले बेड 350 के आसपास हैं, जिनमें सबसे ज्यादा अंबेडकर अस्पताल में हैं। लेकिन सारे बेड फुल हैं, इस वजह से जरूरत वाले कई मरीजों को आइसोलेशन वार्डों में ही रखकर इलाज करना पड़ रहा है। कई मरीजों की स्थिति गंभीर होने की यह बड़ी वजह सामने आ रही है। इसीलिए अंबेडकर के आईसीयू में 50 बेड बढ़ाने की तैयारी शुरू की गई है। हालांकि डाक्टरों का दावा है कि अब अस्पतालों में हर बेड पर आक्सीजन की व्यवस्था की जरूरत आ रही है, क्योंकि ऐसे मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं।
एक सरकारी अस्पताल के सीएमओ ने स्वीकार किया कि आक्सीजन बेड या आईसीयू फुल होने की वजह से ऐसे मरीजों को सरकारी अस्पतालों से भी लौटाने की नौबत आ रही है, या फिर आइसोलेशन वार्ड में रखकर उनका इलाज करना पड़ रहा है। यह ऐसा वार्ड है, जहां कोरोना टेस्ट के पहले लोगों को भर्ती किया जाता है और रिपोर्ट आने के बाद उसे यहां से छुट्टी दी जाती है। जिनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, उसे कोरोना वार्ड में शिफ्ट किया जाता है, जबकि नेगेटिव रिपोर्ट वालों को या तो घर भेजते हैं, या फिर दूसरी बीमारी हो तो संबंधित वार्डों में शिफ्ट कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि संक्रमण न फैले इसलिए अंबेडकर अस्पताल में सैंपल देने वालों को रिपोर्ट आने तक भर्ती करते हैं। ऐसी व्यवस्था एम्स या दूसरे अस्पतालों में नहीं है।
नियमानुसार सर्दी-खांसी,बुखार और सांस में तकलीफ वाले मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना जरूरी है। इसलिए ऐसे मरीजों से एम्स, अंबेडकर अस्पताल और माना लगभग फुल हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन्हें निमोनिया या दूसरी समस्या हो उनके लिए आईसीयू अनिवार्य है। प्रदेश में जो भी मौत हो रही है, उनमें रोजाना पांच से 6 मरीज ऐसे हैं, जिन्हें निमोनिया की गंभीर शिकायत थी फिर भी आइसोलेशन वार्ड में इलाज करना पड़ा। इनमें से कुछ की मौतें भी हुई हैं। देरी से जांच करवाने के कारण यह स्थिति पैदा हो रही है। हालांकि अस्पतालों में गंभीर हालत में पहुंचे मरीज भी अब स्वस्थ होने लगे हैं।

निजी अस्पतालों में भी बेड के लिए वेटिंग
राजधानी समेत प्रदेश के निजी अस्पतालों में गंभीर मरीजों के लिए बेड की मारामारी है। इन अस्पतालों में बेड फुल है और गंभीर मरीजों को भी बेड नहीं मिलता। इस कारण 4 से 5 दिनों की वेटिंग चल रही है। कई बार ऐसे गंभीर मरीजों की मौत भी हो रही है। एक्टिव केस बढ़ने के कारण गंभीर मरीज बढ़ रहे हैं। लक्षण वाले मरीजों का प्रतिशत 35 है। डॉक्टरों की माने तो अब पूरा ध्यान गंभीर मरीजों पर ही देना होगा, जिससे रिकवरी रेट के साथ मौतों की संख्या को कम किया जा सकता है।

अंबेडकर में स्टाफ के ही सैंपल और टेस्ट
प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज व अस्पताल होने के बावजूद अंबेडकर में केवल संदिग्ध स्टाफ का सैंपल टेस्ट किया जा रहा है। शहर के विभिन्न इलाकों से आने वाले लोगों को एम्स, जिला अस्पताल पंडरी, कालीबाड़ी, खोखो पारा और बिरगांव के सैंपलिंग सेंटरों में भेजा जा रहा है। शहर में ऐसे 7 से अधिक सैंपलिंग केंद्र हैं। इसलिए अंबेडकर अस्पताल में स्टाफ या क्वारेंटाइन डॉक्टरों के ही सैंपल लिए जा रहे हैं। अगर कोई कोरोना ओपीडी में आता है और लक्षण नजर आ रहे हैं, तब उसका सैंपल लेते हैं और तब तक भर्ती रखते हैं जब तक कि उसकी रिपोर्ट न आए। कई मरीज तो इस वजह से भी सैंपल के लिए दूसरे सेंटरों में चले जाते हैं।

"किसी भी मरीज को भर्ती करने से इनकार नहीं किया जा सकता। हो सकता है, ज्यादा मरीजों के कारण कभी बेड की कमी हो लेकिन व्यवस्था बनाई जाएगी। कोरोना मरीजों के लिए 50 बेड का आईसीयू जल्दी तैयार हो जाएगा।"
-डॉ विष्णु दत्त, डीन व डीएमई



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अंबेडकर हॉस्पिटल स्थित कोविड सेंटर।


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