बिक्री पर लगाई कई बंदिशें, मेडिकल स्टोर्स रखेंगे हर डोज का हिसाब; डाॅक्टर पर्ची, आधार कार्ड पर ही दवाई , September 23, 2020 at 06:31AM

कोरोना मरीजों के इलाज में फिलहाल रामबाण मानी जाने वाली दवाइयों रैमडेसिविर, फैवीपीराविर और एक्टेमरा की ब्लैकमार्केटिंग का खतरा पैदा हो गया है। पिछले दिनों इनकी बिक्री अचानक बढ़ जाने के बाद अब सिस्टम सख्त कर दिया गया है। डाक्टर की पर्ची, कोरोना रिपोर्ट और आधार कार्ड की फोटो काॅपी जमा करने के बाद ही दवा दुकानों से ये दवाएं दी जा रही हैं। दवा दुकान के संचालकों को भी एक-एक डोज का हिसाब रखने को कहा गया है। ड्रग विभाग की टीम अचानक किसी भी दुकान में पहुंचकर इनका रिकार्ड चेक कर रही है।कोरोना का संक्रमण बढ़ने के साथ ही रैमडेसिविर, फैवीपीराविर और एक्टेमरा के साथ स्टोराइड और एजीथ्रोमाइसिन की बिक्री एकाएक बढ़ गई है। इनमें सबसे ज्यादा डिमांड रैमडेसिविर, फैवीपीराविर और एक्टेमरा की है। इस वजह से इन दवाओं की ब्लैकमार्केटिंग का खतरा पैदा हो गया है। स्थिति को देखते हुए ड्रग विभाग ने सभी दवा दुकान संचालकों के लिए इन तीनों प्रमुख दवाओं का हिसाब रखने का निर्देश जारी कर दिया गया है। दवा दुकान वालों को सख्त निर्देश हैं कि डाक्टर की पर्ची, कोरोना रिपोर्ट और मरीज के आधार कार्ड की फोटो कॉपी के बिना किसी भी सूरत में ये दवाएं किसी को न दें। कोरोना के इलाज में लगातार बदलाव हो रहा है।

प्रारंभिक दिनों में जहां हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को रामबाण मानकर इसी से मरीजों को इलाज किया जाता रहा। वहीं अब हाइड्रोक्सोक्लोरोक्वीन के साथ-साथ कुछ और दवाएं दी जा रही हैं। इनमें रैमबैसी वीर, फैवीपीरा वीर और एक्टेमरा प्रमुख है। कुछ डाक्टरों का मानना है कि हाइड्रोक्सोक्लोरोक्वीन कई बार हार्ट के मरीजों के साथ-साथ कुछ अन्य बड़ी बीमारी के मरीजों को हानि पहुंचा सकती है। इस वजह से इसका विकल्प तलाश किया गया। फिलहाल मरीज को प्रारंभिक लक्षण देखते ही डाक्टर फैवीपीरा वीर दे रहे हैं। उसके बाद रैमबैसी वीर की डोज दी जाती है। एक्टेमरा सबसे अंतिम स्टेज पर दिया जाता है। इसके अलावा डाक्टर बुखार व सर्दी के लिए अलग-अलग दवाओं की डोज दे रहे हैं।

क्यों है ये दवाएं रामबाणफैवीपीराविर : ये दवा वायरल इंफेक्शन के असर को कम करती है। कोरोना का प्रारंभिक लक्षण नजर आते ही डाक्टर तुरंत ही इस दवा को शुरू करते हैं। इसे जल्द शुरू करने से वायरल का लोड कम होता है।

रैमडेसिविर: ये दवा इंजेक्शन की शक्ल में है। कोरोना मरीज को जब सांस लेने में दिक्कत शुरू होते ही डाक्टर इस इंजेक्शन की डोज देते हैं। होम आईसोलेशन में इसकी डोज लेना संभव नहीं है। ये सिर्फ अस्पताल में दी जा सकती है।

एक्टेमरा: इसकी डोज मरीज के लंग्स में ज्यादा इंफेक्शन फैल जाने पर दी जाती है। इसकी डोज शरीर में होने वाले विकृत रियेक्शन को रोकती है। फिलहाल कोरोना के मरीज को बेहद गंभीर स्थिति में यही डोज दी जाती है।

इसलिए बरती सख्ती, ताकि इमरजेंसी में कमी न हो जाए
अंबेडकर अस्पताल के विशेषज्ञ डा ओपी सुंदरानी का कहना है कि ये दवाएं जरूरी हैं। अनावश्यक उपयोग होने से इनकी कमी हो जाएगी। ऐसी दशा में जरूरतमंद मरीजों को ऐन मौके पर दवाएं नहीं मिलेंगी। इस वजह से इन दवाओं के अनावश्यक उपयोग को रोकने के लिए दवा दुकानों से इनकी बिक्री पर सख्त नियम बनाए गए हैं।

दवाओं की ब्रिकी और स्टॉक मेंटेनेंस पर बेहद सावधानी
जिला दवा विक्रेता संघ के अध्यक्ष विनय कृपलानी का कहना है कि दवाओं की बिक्री और स्टाॅक का मेंटेनेंस बेहद सावधानी पूर्वक किया जा रहा है। सभी थोक व चिल्हर विक्रेताओं को एक-एक डोज का हिसाब रखने की सूचना भेज दी गई है। ब्लैकमार्केटिंग की कोई संभावना नहीं है।

होम आईसोलेशन के मरीजों को दिए जा रहे किट में नहीं है फवीपीराविर
होम आईसोलेशन वाले मरीजों को जो दवाओं की किट दी जा रही है, उनमें फैवीपीराविर नहीं दी। मरीजों को केवल हाइड्रोक्सोक्लोरोक्विन, एजिथ्रोमाइसिन, पैरासिटामाल, जिंक व खांसी के अलावा विटामिन की कुछ दवाएं ही दी जा रही हैं। वैसे भी रैमडेसिविर इंजेक्टेबल डोज है, इसे अस्पताल में ही दिया जा सकता है। एक्टेमेरा की डोज भी अस्पताल में दी जा सकती है।

स्वास्थ्य विभाग के डाक्टरों का कहना है कि होम आईसोलेशन में केवल हल्के या बिना लक्षण वाले मरीज ही रह सकते हैं, इसलिए ज्यादा दवा की जरूरत नहीं। होम हाईसोलेशन वाले किसी मरीज की तबियत बिगड़ने पर उसे अस्पताल शिफ्ट कर दिया जाता है। वहां इमजरेंसी वाली सारी जरूरी दवाएं उपलब्ध रहती हैं।



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प्रतीकात्मक फोटो।


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