जब सपने में आए 'बापू' और आजादी के सिपाही को मिल गई जेल से रिहाई, तो गांव ने अपने नाम के आगे जोड़ लिया 'गांधी' , October 02, 2020 at 09:46AM

स्वतंत्रता आंदोलन के एक ऐसे सिपाही वली मुहम्मद भी हैं, जिनके सपने में आए 'बापू' यानी महात्मा गांधी ने जेल से रिहाई दिला दी। सपने में कही बात सच हुई तो उनके गांव ने ही खुद ही नाम के आगे 'गांधी' जोड़ लिया। इसके बाद आज भी छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में इस गांव को 'गांधी गोरकापार' के नाम से जाना जाता है।

बालोद जिले के गुंडरदेही ब्लॉक का गांव गांधी कोरकापारा। स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद के जेल से रिहा होने के बाद एक सपने से गांव के नाम में गांधी जोड़ दिया।

अंग्रेजों के मुलाजिम बन गए गांधी के सिपाही
बात करीब 100 साल पहले साल 1920-21 की है। बालोद जिले के गुंडरदेही ब्लॉक के गांव गोरकापार में वली मुहम्मद पटवारी थे। तब यह ब्लॉक दुर्ग जिले में आता था। वहां एक आदिवासी की भैंस गायब हो गई, जिसका पता एक बूढ़े व्यक्ति ने बताया था। भैंस मिलने के बाद आदिवासी उस बूढ़े को धन्यवाद देने के लिए तलाश कर रहा था।

इसी दौरान वली मुहम्मद उसे मिल गए। संयोग से वली की जेब में महात्मा गांधी की एक फोटो थी। आदिवासी की नजर उस फोटो पर पड़ी तो उसने उस बूढ़े व्यक्ति के तौर पर महात्मा गांधी की पहचान बता दी। इस घटना से वली इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने महात्मा गांधी को संत मानते हुए अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता से जुड़ गए।

देश आजाद होने पर महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी जबलपुर के सभापति सेठ गोविंददास के हस्ताक्षर युक्त एक ताम्रपत्र 15 अगस्त 1947 को प्रदान किया गया। इसे परिजनों ने संभाल कर रखा हुआ है।

सपने में कहे शब्दों ने बदल दिया गांव का नाम
वली मुहम्मद की पहली जेलयात्रा और वहां से रिहाई का किस्सा भी रोचक है। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्हें नागपुर जेल में रखा गया था। वहां से गोंदिया जेल भेज दिया गया। इस दौरान उन्हें जेल में आभास हुआ कि उनके गांव गोरकापार की संत प्रवृत्ति की महिला महात्मा दाई कह रही हैं कि जन्माष्टमी पर तुम्हारी रिहाई हो जाएगी।

महात्मा दाई ने यह बात गोरकापार के लोगों को भी बताई थी। ऐसा हुआ भी। रिहा होकर वली मुहम्मद गोरकापार पहुंचे और महात्मा दाई से मुलाकात की। दाई ने कहा, उन्हें सपने में आकर बापू ने बताया था। इसके बाद से आसपास गांव में मशहूर हो गया कि दाई को स्वप्न में आकर महात्मा गांधी निर्देश देते हैं। इसके बाद गांव के आगे गांधी जुड़ गया।

डौंडी लोहारा में एकजुट किया स्वतंत्रता सेनानियों को
वली मुहम्मद ने डौंडी लोहारा को अपना कर्मक्षेत्र चुना। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को एकजुट किया। उनके प्रमुख सहयोगी बालोद के स्व. सूरज प्रसाद वकील रहे। वहीं कुटेरा के स्व. कृष्णाराम ठाकुर और भेड़ी गांव के रामदयाल ने उनसे प्रेरणा लेकर जंगल सत्याग्रह में भाग लिया। 24 जुलाई 1957 को वली मुहम्मद का निधन हो गया।

वली मुहम्मद ने डौंडी लोहारा को अपना कर्मक्षेत्र चुना। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को एकजुट किया। 24 जुलाई 1957 को उनका निधन हो गया।

वली की स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े किस्से अब किताबों में धरोहर
गुंडरदेही में अमीन पटवारी वली मुहम्मद के स्वतंत्रता सेनानी बनने के किस्से कई किताबों में धरोहर के रूप में सिमटे हुए हैं। उनसे जुड़ी घटनाओं का जिक्र जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग के तत्कालीन महामंत्री बदरुद्दीन कुरैशी के संपादन में 1995 में निकाली गई किताब 'आजादी के दीवाने' और फरवरी 2020 में जगदीश देशमुख की किताब 'छत्तीसगढ़ के भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी' में विस्तार से है।

परिजनों ने संभाल रखी है आजादी से जुड़ी निशानियां
उनके वंशजों के पास मौजूद दस्तावेज के मुताबिक, अंग्रेजी राज के विरोध के चलते उन्हें पहली बार 7 मार्च 1923 को गिरफ्तार कर नागपुर जेल भेजा गया था। इसके बाद से वे कई बार जेल गए। अंतिम बार 1943 से 1945 तक उन्हें नागपुर जेल में रखा गया। देश आजाद होने पर महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी जबलपुर के सभापति सेठ गोविंददास के हस्ताक्षर युक्त एक ताम्रपत्र 15 अगस्त 1947 को प्रदान किया गया।

आजादी के 50 साल बाद सिर्फ एक शिलालेख पर दर्ज हैं चंद लाइनें
स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद के गुजरने के छह दशक बाद भी वह सिर्फ दस्तावेजों में ही हैं। साल 1997 में जब स्वतंत्रता की 50 वीं वर्षगांठ के दौरान उनके नाम का शिलालेख डौंडी लोहारा में लगाया गया। उनके पौत्र और शिक्षा विभाग से रिटायर्ड सहायक संचालक मुहम्मद अब्दुल रशीद खान बताते हैं कि एक मोहल्ले का नाम वली मुहम्मद नगर रखने की पहल की गई थी, लेकिन इस पर भी अब तक सरकारी मुहर नहीं लग पाई है।



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स्वतंत्रता आंदोलन के एक ऐसे सिपाही वली मुहम्मद भी हैं, जिनके सपने में आए 'बापू' यानी महात्मा गांधी ने जेल से रिहाई दिला दी। सपने में कही बात सच हुई तो उनके गांव ने ही खुद ही नाम के आगे 'गांधी' जोड़ लिया।


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