गुरु घासीदास नेशनल पार्क को बनाया जाएगा टाइगर रिजर्व, काले हिरण भी ‘बार’ में, असमिया वनभैसों से बचेगी नस्ल , October 05, 2020 at 06:34AM

मोहम्मद निजाम | किसी जमाने में छत्तीसगढ़ की पहचान माने जाने वाले बाघ (टाइगर) ही नहीं, प्रदेश के राजकीय पशु वनभैंसों की नस्ल बचाना बड़ी चुनौती बन गई है। टाइगर के संरक्षण और सुरक्षा के लिए वन विभाग ने कोरिया जिले के गुरु घासीदास नेशनल पार्क को टाइगर रिजर्व घोषित करने की कागजी प्रक्रिया शुरू कर दी। यहां बाघों की कैप्टिव ब्रीडिंग का भी प्लान है। इधर, राजकीय पशु वनभैंसे की नस्ल बचाने के लिए समान प्रजाति के असम से लाए गए नर-मादा वनभैंस को जंगल में छोड़ दिया गया है। माना जा रहा है कि एकमात्र मादा वनभैंस के बूढ़ी होने और उसकी क्लोन से मिसब्रीडिंग के खतरे के बीच, यह नया जोड़ा प्रदेश में वनभैंसों की नस्ल बचाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
राज्य बनने के बाद प्रदेश में वनभैंसे को राजकीय पशु घोषित किया गया। तब माना जा रहा था कि यहां लगभग 70 वनभैंसे हैं। लेकिन उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट में गणना की गई तो वन विभाग भौंचक रह गया, क्योंकि 6 नर और एक मादा ही मिली। चूंकि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट के अलावा वनभैंस छत्तीसगढ़ में कहीं नहीं, इसलिए और खोजबीन करने का कोई औचित्य नहीं था। वन विभाग ने बचे हुए नर और मादा वन भैंस से ही नस्ल बचाने का बीड़ा उठाया। 2001 में जंगल के भीतर जुगाड़ में रेस्क्यू सेंटर बनाकर वहां मादा वन भैंस की कैप्टिव ब्रीडिंग करवायी गई। उससे वनभैंस की संख्या तो 14 हो गई, लेकिन एक मां के पेट से जन्म लेने वालें नर और मादा वनभैंस की मेटिंग से नस्ल बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया। विशेषज्ञों की राय से हरियाणा में मादा वन भैंस का क्लोन पैदा करवाया गया। इसमें करीब डेढ़ करोड़ खर्च हुए। तीन साल के इंतजार के बाद मादा क्लोन तो आया गया, लेकिन इससे मेटिंग करवाने पर भी इनब्रीडिंग का खतरा बताया गया। यानी पैदा होने वाली नस्ल ही बिगड़ने का खतरा बताया गया। इस फार्मूले के फेल होने के बाद असम से नर और मादा वनभैंस को पकड़कर लाया गया। अब उनसे नस्ल बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

असम के जंगलों में 41 दिन ऑपरेशन, तब मिला जोड़ा
छत्तीसगढ़ के वन अफसरों की टीम पहले लॉकडाउन में असम रवाना हुई। लॉकडाउन के दौरान ही वहां 41 दिनों तक ऑपरेशन चलाकर नर और मादा वनभैंस को पकड़कर लाया गया। उन्हें पकड़ने के बाद डीएनए की जांच की गई और यह देखा गया कि दोनों एक ही मां से जन्मे तो नहीं है। दोनों का डीएनए अलग था, इसलिए उन्हें लाया गया। डीएनए एक होने पर मिसब्रीडिंग का खतरा हो सकता था। फिलहाल नर और मादा वनभैंस को बारनवापारा के रेस्क्यू सेंटर में रखा गया है। वहां रखकर उनकी नस्ल बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार छत्तीसगढ़ में वन्य प्राणियों की नस्ल को बचाने के लिए सबसे ज्यादा प्रयास वनभैंस के लिए ही किए गए हैं।

सुरक्षा और नस्ल पर फोकस : पीपीसीएफ वाइल्ड लाइफ नरसिंव राव का कहना है हमारा फोकस राज्य में विलुप्त हो रहे उसकी कगार पर खड़े वन्य प्राणियों की सुरक्षा है। बाघों के नए बसेरे के साथ कैप्टिव ब्रीडिंग का प्लान है। राजकीय पशु वनभैंसे के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, इसके नतीजे जल्द सामने आएंगे।

विलुप्त काले हिरण छोड़े बारनवापारा में
बारनवापारा में करीब 100 साल पहले विलुप्त हो चुके काले हिरण दोबारा बसाने की कोशिश चल रही है। जंगल सफारी से 50 काले हिरणों का झुंड वहां छोड़ा गया। हिरणों को पहले घने जंगल में एक बाड़े में रखा गया। करीब 100 हेक्टेयर का बाड़े में रखकर उन्हें खुले जंगल में रहने का अहसास करवाया गया, ताकि उनमें पालतू होने का भाव खत्म हो और वे खुले जंगल में रहकर अपनी रक्षा करना सीख सकें। अफसरों के अनुसार जैसे ही उनमें जंगली होने का भाव पैदा होगा, सभी जंगल में छोड़ दिए जाएंगे। ये देश में अनूठा प्रयास है। ऐसा कम राज्यों में ही किया गया है।



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वनभैंसा।


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