मासूम से लेकर बुजुर्ग ने कोरोना को दी मात, वेंटीलेटर के सहारे भी जीती कोरोना से जंग, मरीज की इच्छाशक्ति बड़ी दवा , October 17, 2020 at 06:18AM

पीलूराम साहू | प्रदेश में शुक्रवार को कोरोना से 1.26 लाख से ज्यादा मरीज स्वस्थ हो गए हैं। इनमें अस्पताल से 66500 व होम आइसोलेशन से 58865 मरीज स्वस्थ हुए हैं। दूसरी ओर कोरोना से 1400 के आसपास मौत हो चुकी है। ऐसे में मासूम से लेकर बुजुर्ग ने कोरोना को मात दी है। यही नहीं वेंटिलेटर पर गंभीर मरीज ने भी कोरोना की जंग जीती है।
डॉक्टरों के अनुसार ऐसा मरीज की इच्छा शक्ति व डॉक्टरों के प्रयास से ही संभव हो पाया है। परिजनों का भी कहना है कि वे उम्मीद छोड़ चुके थे, लेकिन भगवान, डॉक्टरों व स्टाफ ने नया जीवन दे दिया। दैनिक भास्कर ऐसे मरीज व उनके परिजनों से चर्चा का उनके संघर्ष को जाना। 1 साल के मासूम को सितंबर के दूसरे सप्ताह में कोरोना हुआ। उनके पिता राजेंद्र ठाकुर बताते हैं कि वे पत्नी व बच्चे को लेकर राजधानी के नामी मार्केट गए थे। एक-दो दिन बाद हल्की सी खांसी व गले में खराश हुआ। यह लक्षण तीनों में थे। कोरोना की आशंका में सभी ने कालीबाड़ी में जांच करवाए। दुर्भाग्य से तीनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। तीनों को आंबेडकर अस्पताल में भर्ती किया गया। सबसे ज्यादा चिंता मासूम को लेकर थी। इससे पहले बेटा कभी 1 दिन के लिए अलग नहीं रहा। इलाज के दौरान 15 दिन अलग रहा। हम तीनों का इलाज अलग-अलग वार्डों में किया गया। बेटे को लेकर चिंता ऐसी थी की रात को नींद नहीं आती थी। लेकिन स्टाफ से चर्चा कर सुकून मिलता था कि उनका बेटा स्वस्थ हो रहा है। पत्नी भी स्वस्थ हो गई। वे और पत्नी दोनों पहले डिस्चार्ज हुए, बाद में बेटा। 15 दिनों बाद जब बेटे को गोद में लिया तो ऐसा लगा कि मासूम का नया जन्म हुआ है।

केस एक
रायपुर के 1 साल के मासूम को कोरोना हो गया। उसके साथ उसकी मम्मी व पिता भी कोरोना से संक्रमित हो गए। इलाज के दौरान मासूम उसकी मां और पिता अलग-अलग वार्डों में रहे। 15 दिनों के इलाज के बाद मासूम स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर आई।

केस दो
65 साल की महिला को पहले से ही दिल की बीमारी है। जब अस्पताल पहुंचीं तो सांस लेने में दिक्कत थी। 10 दिनों तक वेंटिलेटर पर रही, लेकिन लगातार इलाज के बाद 20 दिनों बाद वह स्वस्थ होकर घर लौटीं। अभी वह स्वस्थ है।

वेंटीलेटर में जाने के बाद उम्मीद कम थी
जब मां कोरोना के कारण गंभीर हुई और वेंटीलेटर पर गईं तो बचने की उम्मीद कम थी। यह कहना है प्रशांत साहू का। 2 साल पहले उनके हार्ट की एंजियोप्लास्टी हुई थी इसलिए वह कुछ कमजोर भी थी। मां को कोरोना कैसे हुआ पता नहीं चला। 10 दिनों बाद वेंटीलेटर से बाहर आईं तो थोड़ी उम्मीद जगी। डॉक्टरों ने भी कहा कि खतरे की कोई बात नहीं है। तब जाकर शांति मिली। अस्पताल से छुट्टी के बाद वह घर में है और घर से बाहर नहीं निकलती। लोगों से आग्रह है कि उम्रदराज लोगों को गैर जरूरी कामों से घर से बाहर ना भेजें।

85 की उम्र में कोरोना को हराया
सूरजपुर की 85 साल की महिला को कोरोना हुआ तो परिजन चिंतित हो गए। उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गय। आश्चर्य के विपरीत 12 दिनों में वह स्वस्थ भी हो गईं। महिला का पोता डेविड राज ने बताया कि दादी के स्वास्थ्य को लेकर काफी चिंता थी, लेकिन डॉक्टरों व स्टाफ की मेहनत रंग लाई और दादी की जान बच सकी। दादी स्वस्थ है और खतरे से बाहर है। दादी घर आने वाले लोगों को कोरोना से बचने के लिए जरूरी सावधानी बरतने की बात कहती रहती हैं।

मरीज की इच्छाशक्ति बड़ी दवा
"कोरोना से सवा लाख मरीज स्वस्थ हो चुके हैं। यह राहत भरी खबर है। कोरोना को लेकर बेवजह लोगों के मन में डर रहता है। कई लोगों की हालत तो इसलिए बिगड़ जाती है क्योंकि उसमें इच्छा शक्ति कमजोर होती है। इलाज के दौरान हमने देखा है कि उम्रदराज से लेकर गंभीर मरीजों की जान बची है। वह केवल मरीज की इच्छाशक्ति और डॉक्टरों की मेहनत का परिणाम है।"
-डॉ. आरके पंडा, सदस्य कोरोना कोर कमेटी

मन से मजबूत बनें, डर निकालें
"कोरोना को मात देखकर लोग लगातार स्वस्थ हो रहे हैं और यही कारण है कि कोरोना को मात देने वालों की संख्या सवा लाख के ऊपर पहुंच चुकी है। कोरोना का डर लोगों को गंभीर बना रहा है। हमने ऐसे मरीजों को भी देखा है, जो कोरोना से डरने के बजाय जमकर मुकाबला करते हैं। जब तक मन से बेवजह डर नहीं जाएगा, कोरोना को नहीं हराया जा सकता।"
-डॉ. देवेंद्र नायक, सीनियर गैस्ट्रो सर्जन



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
कोरोनाकाल है, लेकिन श्रद्धा उस पर भारी है। ये ठीक है कि इस बार सार्वजनिक पूजा उत्सव में कमी आई है, लेकिन पूजा तो होगी ही। माता की प्रतिमाएं रायपुर में माना के आसपास बनाई जाती हैं। यहां इस बार सिर्फ 150 से 180 प्रतिमाएं ही बनीं हैं। पिछले साल इनकी संख्या तकरीबन एक हजार थी। पिछले साल जो मूर्तियां बिकीं, वो दो लाख 15 हजार रुपए तक की थीं, जबकि इस बार अधिकतम 50 हजार रुपए की मूर्तियां हैं। कलाकार रंजीत विश्वास कहते हैं कि छोटी छोटी मूर्तियों के आर्डर हैं। भक्ति और उल्लास वही है, लेकिन लोग सावधानी से उत्सव मना रहे हैं। फोटो- भूपेश केशरवानी


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/3kiNSYI

0 komentar