राजधानी में मोतियाबिंद ऑपरेशन नहीं के बराबर, नसबंदी पिछड़ी, बच्चों को टीके भी कम लगवा रहे लोग , December 01, 2020 at 06:40AM

संदीप राजवाड़े | कोरोना ने आम लोगों में अस्पतालों का ऐसा डर पैदा किया है कि बेहद जरूरी इलाज के लिए भी लोग अस्पताल जाने से परहेज कर रहे हैं। राजधानी वाला रायपुर जिला, जो मोतियाबिंद और नसबंदी ऑपरेशनों के मामले में टाॅप में रहता है, बच्चों के टीके भी यहां सर्वाधिक संख्या में लगते हैं, वही कई मामलों में बुरी तरह पिछड़ गया है। मोतियाबिंद के ऑपरेशन तो टारगेट से 20 प्रतिशत ही हो पाए हैं। यही हाल नसबंदी का है। अब तक रायपुर में जितने नसबंदी ऑपरेशन हो जाने चाहिए थे, उसके 40 प्रतिशत ही हुए हैं। यहां तक कि लोग इस समय बच्चों की टीके लगवाने से भी परहेज कर रहे हैं। बीसीजी जैसा जरूरी टीका, जो हमेशा लक्ष्य से अधिक लगता है, वह भी अब तक 70 प्रतिशत ही लग पाया है।
कोरोना ने पिछले कुछ माह में सारी बीमारियों को पीछे छोड़ दिया है। खासतौर से ऐसे मर्ज, जिन्हें बेहद गंभीरता से लिया जाता रहा है, लोग कोरोना की वजह से उन्हें भी टाल रहे हैं। यहां तक कि राजधानी रायपुर और लगे हुए ब्लाक धरसींवा (रायपुर), अभनपुर, तिल्दा व आरंग में इस साल अप्रैल से अक्टूबर तक नियमित रुप से चलने वाले स्वास्थ्य अभियान तक सही तरीके से नहीं चल पाए हैं। इनमें से अधिकतर अपने 8 महीने के टारगेट से ही काफी दूर रह गए हैं। इसकी दो ही वजहें हैं। पहली, लोग कोरोना की वजह से अस्पतालों से दूरी बनाए हुए हैं। दूसरा, अगर लोग अस्पताल भी पहुंच जाएं तो हेल्थ का अधिकांश अमला कोरोना से लड़ने में ही लगा है, बाकी के लिए डाक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ कम पड़ गया है।

कुपोषण मुक्त करने का अभियान भी बुरी तरह प्रभावित
कोरोना की वजह से मोतियाबिंद, नसबंदी और बीसीजी टीके के साथ-साथ कुपोषण मुक्त करने का अभियान भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जैसे, रायपुर में मोतियाबिंद ऑपरेशन का टारगेट 20,000 सर्जरी का है। अर्थात पिछले 8 माह में 11667 सर्जरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन केवल 2569 ही हुई हैं। यह टारगेट का 22 फीसदी भी नहीं है। जबकि पिछले साल इन्हीं 8 महीनों में 8333 था, लेकिन 20438 मोतियाबिंद ऑपरेशन हो चुके थे, यानी टारगेट से 245 प्रतिशत। आरंग बीएमओ डॉ. केएस राय का कहना है कि मोतियाबिंद ऑपरेशन करवाने वाले आमतौर से बुजुर्ग ही रहते हैं जो कोरोना की वजह से अस्पताल आने से कतरा रहे हैं। जबकि अस्पताल में यह ऑपरेशन पूरी सावधानी के साथ हो सकते हैं। तिल्दा बीएमओ डॉ. आशीष सिन्हा का कहना है कि हेल्थ अमले के कुछ कर्मी, कोरोना के रोकथाम में लगे रहे लेकिन अस्पतालों में टीके से लेकर अन्य हेल्थ अभियान चल रहे थे, लेकिन लोग ही वहां नहीं पहुंच पाए। हेल्थ अफसरों का कहना है कि लाॅकडाउन के दौरान तो सारे अभियान लगभग बंद ही रहे। पिछले तीन चार महीने में बच्चों का कुछ बीमारियों का वैक्सीनेशन ही लक्ष्य से 90 फीसदी के करीब पहुंच पाया है।

बीसीजी टीके सबसे कम : रायपुर में सभी टीकों के लिए बच्चों की टारगेट संख्या 57867 है। पिछले 8 महीने में 33756 को सभी टीके लगने थे, जबकि 30624 को लगे। यह तो टारगेट का 91 फीसदी कवर हो गया, लेकिन बच्चों को बीसीजी टीके लगाने के मामले में हेल्थ अमला काफी पिछड़ गया। इस टीके का टारगेट 33756 था, लेकिन यह केवल 23773 को लग पाया है यानी बमुश्किल 70 फीसदी। इसी तरह, पिछले 8 महीने में 280 कुपोषित बच्चों को एनआरसी में भर्ती कराना था। लेकिन लोगों ने अपने बच्चों को नहीं भेजा, इस वजह से अब तक केवल 10 बच्चे ही एनआरसी में पहुंचाए जा सके हैं। अर्थात लक्ष्य से केवल 4 फीसदी ही।

नसबंदी आधी भी नहीं
नसबंदी के मामले में रायपुर के जो आंकड़े आ रहे हैं, उनके मुताबिक इस ऑपरेशन को भी कोरोना ने बुरी तरह प्रभावित किया है। प्रदेश में पिछले आठ-दस महीनों में नसबंदी के शिविर नहीं लगे और लोग खुद से हेल्थ सेंटरों तक भी नहीं पहुंचे। इस साल नसबंदी का रायपुर में 6000 का टारगेट था। पिछले 8 माह में 3500 ऑपरेशन हो जाने चाहिए थे, लेकिन केवल 1454 यानी सिर्फ 42 फीसदी ही हो पाए हैं। हालांकि चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया कि लोग नसबंदी में पीछे रहे, लेकिन गर्भधारण रोकने के अस्थायी उपाय जैसे लूप (कॉपर टी) वगैरह में काफी आगे हो गए। यह आंकड़ा टारगेट से 200 फीसदी तक पहुंच गया है। रायपुर में लूप निवेशन का सालभर का लक्ष्य 6490 है, लेकिन पिछले आठ माह में ही यह 7520 पर पहुंच गया है। जबकि पिछले साल इन 8 महीनों में टारगेट से 166% ही रहा।

प्रभाव तो पड़ा है
"कोरोना से सभी प्रभावित हुए हैं, हेल्थ से जुड़े अभियान भी। लेकिन यह भी है कि कई जगह लोग नहीं जा पाए तो हेल्थ वर्कर ने घर जाकर सुविधा दी है। अब सभी अभियानों के आंकड़े बढ़ रहे हैं।"
-डॉ. मीरा बघेल, सीएमएचओ रायपुर



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रायपुर एम्स (फाइल फोटो)।


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