30 हजार आदिवासियों को उम्मीद कि बसेंगे वीरान गांव, 14 साल बाद लौटेंगे घर , January 01, 2021 at 06:02AM

2021... बदलाव की बयार लेकर आ रहा यह नया साल बस्तर के विस्थापित आदिवासियों के लिए भी बड़ी उम्मीद बनकर आ रहा है। करीब डेढ़ दशक पहले सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान बेघर हुए हजारों आदिवासियों को घर लौटने की उम्मीद बंधी है। उन्हें सम्मानजनक रूप से वापस लेने के प्रयास रंग ला रहे हैं, सरकार से बातचीत भी सकारात्मक है। बस कुछ फैसलों के बाद घर वापसी सुनिश्चित होने की आस है।
बस्तर के 30 हजार से ज्यादा आदिवासी आज भी अपना घर-गांव छोड़कर सीमावर्ती राज्य आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में शरण लिए हुए हैं। वर्ष 2005 से 2007 के बीच 1 लाख से अधिक आदिवासी अपनी जमीन छोड़कर सीमावर्ती राज्यों में चले गए थे। तब से यह 14 बरस उनके लिए वनवास जैसे ही थे। ना वहां उन्हें किसी तरह की पहचान मिल पाई, ना ही वोट देने का अधिकार मिला। कुछ सामाजिक संगठनों की कोशिश से 2019 में 15 परिवारों को बस्तर में बसाया गया है, बाकी की वापसी के लिए सरकार से बातचीत चल रही है।

उनकी जुबानी.. जिन्हें छोड़नी पड़ी जमीन
50 एकड़ जमीन थी, अब मजदूरी कर रहे
आंध्र प्रदेश की सीमा पर रहने वाले आयतु (परिवर्तित नाम) बताते हैं कि सलवा जुडूम के साथ ही हिंसा होने लगी। कुछ लोग बंटकर नक्सल समर्थक हो गए, कुछ नक्सल विरोधी। गांव के गांव खाली करवाए जाने लगे। हमारे पास 2 रास्ते थे, या तो सरकारी कैंपों में जाएं या जंगलों में नक्सलियों का साथ दें। विपरीत परिस्थिति में हमने तीसरा रास्ता चुना और आंध्र में शरण ले ली। लेकिन जहां हमारे पास 50 एकड़ का खुद का खेत था अब हम यहां दूसरे के खेतों में मजदूरी कर रहे हैं।

बेटा 15 का हो गया, संस्कृति का ज्ञान नहीं
तेलंगाना के जंगल से सटे एक इलाके में बस्तर से गए 30 परिवारों ने अपनी बस्ती बसाई है। यहां रहने वाले हरीश (परिवर्तित नाम) ने बताया कि कोंटा के पास के गांव में पूरा परिवार रहता था। जब बेटा 6 महीने का था तब हमें घर छोड़ना पड़ा। अब बेटा 15 साल का हो गया हम उसे अपनी संस्कृति के बारे में जितना बता सकते थे बता रहे हैं लेकिन अपनी मिट्‌टी, अपने देवी-देवता और अपनी परंपरा से दूर होने का नुकसान हमें भुगतना पड़ रहा है।

सकारात्मक बातचीत जारी, जल्द हल निकलेगा : चौधरी
विस्थापन के लिए कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं कि 30 हजार से अधिक आदिवासी अब भी शरणार्थी जैसे बसे हैं। इसका सही आंकड़ा किसी राज्य सरकार के पास नहीं है। हम छत्तीसगढ़ सरकार और अनुसूचित जनजाति आयोग के संपर्क में हैं। सकारात्मक प्रयास अंतिम दौर में हैं, इनके पूरे होते ही वापसी शुरू हो जाएगी।



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तेलंगाना के एक गांव में विस्थापित परिवार की बच्ची।


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