राजनांदगांव में बापू की आदमकद मूर्ति लगवाने के लिए अड़ गए थे मोतीलाल, गांधी परिवार के भरोसेमंद इतने कि दिल्ली बुलाकर दिया CM का ताज , December 22, 2020 at 10:35AM

बात 1958 की है जब मोतीलाल वोरा राजनांदगांव में महात्मा गांधी की आदमकद कांस्य की प्रतिमा लगवाने के लिए अड़ गए थे। इसके बाद मोतीलाल धीरे-धीरे गांधी परिवार के इतने करीब और खास हो गए कि 1985 में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दिल्ली बुलाकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का ताज सौंप दिया। बता दें कि कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल वोरा (93) का सोमवार को निधन हो गया। दिल्ली के फोर्टिंस अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। मोतीलाल वोरा का अंतिम संस्कार मंगलवार को शाम 4 बजे दुर्ग में होगा। उनका पार्थिव शरीर कल सुबह 10 बजे दिल्ली से रायपुर पहंचेगा।

साल 1985 की बात है। मध्यप्रदेश के चुनाव में अर्जुन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की थी। उस समय मोतीलाल वोरा के पास प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी थी। अर्जुन सिंह ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली। मंत्रिमंडल की सूची पर आलाकमान की मुहर लगवाने दिल्ली पहुंच गए, पर वहां कुछ और तैयारी थी। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को पंजाब का गर्वनर बनने के आदेश दे दिया। ऐसे में पूरी राजनीति गर्मा गई कि मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री कौन होगा।

कैबिनेट मंत्री की चाहत लेकर पहुंचे, ऐसे CM बना दिए गए मोतीलाल
अर्जुन सिंह वहां से विदा होने लगे तो प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनसे पसंद का मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का नाम बताने के लिए कहा। इस पर अर्जुन सिंह बाहर निकले और बेटे अजय को कॉल कर मोतीलाल वोरा को दिल्ली लाने के लिए कहा। वहीं वोरा कैबिनेट मंत्री बनने की चाहत में अजय से सिफारिश में लगे थे। दिल्ली पहुंचते ही मोतीलाल वोरा के सामने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का ताज था।

मध्यप्रदेश के सियासत की यह तस्वीर दिग्गजों की कहानी बताती है। इसमें मोतीलाल वोरा के साथ ही श्यामाचरण शुक्ल, दिग्विजय सिंह, अर्जुन सिंह और कमलनाथ साथ हैं।

मोतीलाल वोरा ने पत्रकार के तौर पर कई साल तक पत्रकारिता भी की। वे फुटबॉल के भी शौकीन थे। इसके बाद जब राजनीति का रूख किया तो पार्षद से मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक का सफर तय कर लिया। 92 साल की उम्र में भी छत्तीसगढ़ और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे। कांग्रेस के उन चुनिंदा वफादार नेताओं में शामिल जो सोनिया गांधी के साथ-साथ नरसिम्हा राव का भी विश्वासपात्र रहे।

राजनीति के शौक ने पहले पार्षद, फिर विधायक बना दिया
मोतीलाल वोरा की पढ़ाई रायपुर और कोलकाता में हुई। फिर बन गए एक हिंदी अखबार में पत्रकार, पर मन कहीं राजनीति में अटका था। ऐसे में उन्होंने प्रजा समाजवादी पार्टी का झंडा उठाया। साल 1968 में दुर्ग से पार्षद का चुनाव लड़ा और जीत भी दर्ज की। पर अभी उनकी किस्मत का असली बाजी पलटना बाकी था। यह मौका मिला पूर्व मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र के दुर्ग दौरे से। उनको दुर्ग में नया चेहरा चाहिए था।

मध्य प्रदेश की राजनीति से हटकर अब दिल्ली की संगठन में वोरा एक्टिव हो गए। दौर भी बदल चुका था। राजीव गांधी के बाद अब नरसिम्हा राव थे।

साल 1972 में पहली बार विधानसभा का चुनाव जीत राज्यमंत्री बने
किसी ने बताया कि प्रजा समाजवादी पार्टी में एक नया लड़का है। पार्षद का चुनाव भी जीता है। इस पर पूर्व CM मिश्र ने मिलने के लिए संदेश भेजा। मोतीलाल वोरा जैसे इसी इंतजार में थे। उन्होंने भी कांग्रेस का हाथ थामा और साल 1972 के विधानसभा चुनाव में पहली बार विधायक चुने गए। तब पीसी सेठी ने CM पद की शपथ ली और करीब होने के इनाम में वोरा को राज्य परिवहन निगम का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया।

जब दिग्गज हारे, तब भी वोरा ने जीत की बढ़त बनाई
साल 1975, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी और उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी। इसके दो साल बाद यानी 1977 में चुनाव हुए। जनता पार्टी ने अपनी सरकार बनाई, कांग्रेस बुरी तरह हारी। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के दिग्गज नेता श्यामाचरण शुक्ल सहित सिटिंग CM तक हार गए। इन सबके बीच कांग्रेस विरोधी लहर में भी मोतीलाल वोरा ने दुर्ग से 54 फीसदी वोट पाकर जीत दर्ज की।

छत्तीसगढ़ के CM और राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद अंतरिम अध्यक्ष बनने के लिए वोरा का नाम सिर्फ चर्चाओं में ही रहा।

अर्जुन सिंह के खिलाफ हथियार बने तो राज्यपाल का पद मिला
वोरा अब बड़ी राजनीतिक शख्सियत बन चुके थे। मध्य प्रदेश की राजनीति से हटकर अब दिल्ली की संगठन में एक्टिव हो गए। दौर भी बदल चुका था। राजीव गांधी के बाद अब नरसिम्हा राव थे। ऐसे में अर्जुन सिंह के खिलाफ राव को एक हथियार चाहिए था, जो वोरा के रूप में सामने था। नतीजा यह हुआ कि अर्जुन सिंह को पार्टी छोड़नी पड़ी और वोरा को इनाम में साल 1993 में UP के राज्यपाल का पद मिला।

सोनिया के विश्वास पात्र से राहुल के इस्तीफे के बाद अध्यक्ष तक की चर्चा में
अब आया साल 1996, जब राज्यपाल की कुर्सी छोड़कर वोरा को फिर मध्य प्रदेश की सियासत में लौटना पड़ा। साल 1998 के चुनाव में राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) से चुनाव जीते। हालांकि तब तक राव का भी दौर खत्म हो चुका था। राजीव गांधी के विश्वसनीय होने के कारण वे जल्द ही सोनिया गांधी के खेमे में आ गए। इसके बाद राज्यसभा में सांसद तो बने, लेकिन छत्तीसगढ़ के CM और राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद अंतरिम अध्यक्ष बनने के लिए उनका नाम सिर्फ चर्चाओं में ही रहा।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी मोतीलाल वोरा दुर्ग की राजनीति से दूर नहीं हुए। साल 1985 में नगर निकाय चुनाव के दौरान पूर्व मेयर गोविंद लाल ढींगरा के पद्ननाभपुर स्थित निवास पर राजनीतिक मंत्रणा के लिए पहुंचे थे।


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Motilal Vora Memories: From MLA To Madhya Pradesh CM To Governor; Senior Congress Leader Dies At 93 At Delhi Hospital


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